बर्फ का घर

रेत के महलों से भी ज्यादा कच्चा निकला वो रिश्ता,
जिसको बचाने के लिए हमने सब कुछ था गंवाया।
अब राख बन चुकी है वो मोहब्बत की कहानी,
जिसे हमने अपनी जिंदगी का पहला सच बताया।

खामोश चीखें

अंदर का शोर बाहर आने से डरता है,
यह जमाना सिर्फ तमाशा करना जानता है।
रो लेते हैं छुपकर रातों की चादर ओढ़कर,
ये दिल रोज अपनों से ही हारता रहता है।

धुंधला रास्ता

चल पड़े थे जिस सफर पर हाथ थाम कर तेरा,
आज उस रास्ते पर सिर्फ अकेले खड़े हैं हम।
मंजिल का तो पता नहीं ऐ हमसफर मेरे,
खुद के वजूद की तलाश में रोज लड़ रहे हैं हम।

बंजर जमीन

दिल की जमीन पर उम्मीदों के फूल उगाए थे,
मगर बेवक्त की आंधियों ने सब झुलसा दिया।
अब तो खुद की परछाई से भी डर लगता है हमें,
किस्मत ने ऐसा मंशा का शीशा गिरा दिया।

अंतिम पन्ना

किताब-ए-जिंदगी का एक और पन्ना मुड़ गया,
जो कल तक अपना था आज वो पीछे छूट गया।
ढूंढते रहे हम वजह इस दूरी की यारों,
वक्त बदला और हमारा हर सपना रूठ गया।

कांच के टुकड़े

खुद को समेटने की हर कोशिश बेकार हुई,
हाथों में फिर से वही पुराने ज़ख्म आए।
जिसको चाहा था शिद्दत से अपनी रूह में,
वही शख्स आज हमें अजनबी नज़र आए।

अंतिम विदाई

बिना कुछ कहे, बिना किसी शोर के चुपचाप जिंदगी से रुखसत हो गए वो, और हम पीछे छूट गए सिर्फ उनकी मीठी यादों और अनगिनत सवालों के सहारे।

वक्त की रेत

मुठ्ठी में रेत की तरह फिसल गया हर वो रिश्ता जिसे हमने अपनी जान से ज्यादा संभाला था। चाह कर भी किसी को रोक नहीं पाए, बस हाथ की लकीरों को देखते रह गए।

तड़पते साए

तेरी परछाई की तलाश में हम अंधेरों से भी दोस्ती कर बैठे, पर अफसोस कि उजाला होते ही वो परछाई भी कहीं ओझल हो गई।

टूटे अरमान

बचपन के खिलौनों की तरह संजोए थे कुछ हसीन सपने, जिन्हें हकीकत की आंधी ने पलभर में धूल बना दिया। अब तो कांच की तरह बिखर चुका है मेरा हर एक सपना।

मौन की दीवार

अब शिकायतें करने का हक भी किसी को नहीं दिया हमने, क्योंकि जब अपने ही दूर हो जाएं तो शिकवे किससे किए जाएं। बस खामोशी ही अब हमारी सबसे बड़ी हमसफर है।

बदले रिश्ते

वक़्त के साथ लोगों के बदलते रंग देखकर अब हैरानी नहीं होती, बस खुद पर तरस आता है कि हमने गैरों को अपना समझने में उम्र गुजार दी।

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इस संग्रह की सबसे पढ़ी रचनाएँ

अधूरे ख्वाब

कुछ रास्ते खुद ब खुद मुड़ जाते हैं, दिल के अरमान आंसुओं में जुड़ जाते हैं। तन्हाइयों का सफर अब आसान लगता है, जब अपने ही बेगाने बन जाते हैं।

खामोशियां

लबों पर हंसी सजाए रखते हैं सब के लिए, अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं अकेले। कोई तो समझे इस खामोशी की जुबान को, हम खुद से ही रोज बिछड़ते रहते हैं।

अधूरी चाय

तुम्हारी पसंद की वो कड़क चाय अब फीकी लगने लगी है, लगता है तुम्हारे जाने से हमारी सुबह की तासीर बदल गई है।

बिछड़े रास्ते

वक्त के साथ सब बदल गया यहां, हमारा साया भी अब हमसे रूठ गया। उम्मीदों की जो डोर थामी थी हमने, वो एक झटके में आज टूट गया।