खामोशियां

खामोशियां

“
लबों पर हंसी सजाए रखते हैं सब के लिए, अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं अकेले। कोई तो समझे इस खामोशी की जुबान को, हम खुद से ही रोज बिछड़ते रहते हैं।
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