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अस्पताल के बाहर बैठी रूहानी उम्मीद

अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच समय जैसे थम सा गया था। बाहर बेंच पर बैठी सुशीला देवी लगातार भगवान से अपने इकलौते बेटे की सलामती की दुआ मांग रही थी। अंदर डॉक्टर सर्जरी में जुटे थे और बाहर हर एक सेकंड भारी गुजर रहा था। तभी एक अजनबी शख्स उनके पास आया, जिसने कुछ साल पहले खुद अपना बेटा खो दिया था। उस अजनबी ने सुशीला का कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में थामा और बिना कुछ कहे सिर्फ ढांढस बंधाया। उस स्पर्श में एक अनोखा सुकून था, जैसे किसी ने घाव पर मरहम लगा दिया हो। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। सुशीला की आंखें खुशी से छलक उठीं और उसने उस अजनबी को धन्यवाद दिया, जो फरिश्ता बनकर उसकी जिंदगी में आया था।

दूसरी मंजिल की खाली खिड़की

रोहित अपने परिवार के साथ एक नए किराए के मकान में रहने आया था। मकान का किराया बहुत कम था क्योंकि उसके बारे में मोहल्ले में कई तरह की बातें मशहूर थीं। घर की दूसरी मंजिल पर एक खिड़की थी जिस पर हमेशा काले रंग का पर्दा पड़ा रहता था। रोहित के लाख मना करने के बावजूद उसके छोटे बेटे ने एक दिन जिज्ञासावश वह पर्दा हटा दिया। उस पल के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। रात को उस खिड़की के शीशे पर बाहर से किसी के नाखून खुरचने की आवाजें आने लगीं और घर के सभी नल अपने आप खुलने लगे। जब उन्होंने मकान मालिक से पूछा, तो पता चला कि उस खिड़की के सामने खड़े होकर किसी ने आत्महत्या की थी और उसकी रूह आज भी वहीं भटकती है।

अंधेरे कमरे का रहस्य

हमारे नए मकान का एक कमरा हमेशा ठंडा रहता था और वहां से अजीब सी सरसराहट की आवाजें आती थीं। मैंने एक रात हिम्मत करके उस कमरे का दरवाजा खोला तो अंदर कोई नहीं था, बस एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी थी जो खुद-ब-खुद हिल रही थी। उस पर धूल की परत जमी थी जिस पर किसी छोटे बच्चे के नंगे पैरों के निशान बन रहे थे। अचानक कमरे की खिड़की अपने आप जोर से बंद हो गई और हवा में एक डरावनी फुसफुसाहट गूंजी। मैंने जब पीछे मुड़कर देखना चाहा तो कोई अदृश्य शक्ति ने मेरा गला दबोच लिया और मेरी सांसें रुकने लगीं। किसी तरह मैंने खुद को छुड़ाया और उस घर से बाहर भागा, लेकिन आज भी मुझे लगता है कि वो परछाई मेरा पीछा कर रही है।

समुद्र किनारे की एक शाम

मुंबई की समंदर किनारे वाली मरीन ड्राइव पर हर शाम हजारों लोग आते थे, लेकिन कबीर और सिमरन के लिए यह जगह रूहानी सुकून का जरिया थी। कबीर एक पेंटर था जो रंगों के जरिए जज्बात बयां करता था, और सिमरन एक शास्त्रीय गायिका थी जो सुरों से दिल जीत लेती थी। दोनों की पहली मुलाकात एक आर्ट गैलरी में हुई थी जहाँ कबीर सिमरन का पोर्ट्रेट बना रहा था। धीरे-धीरे कला के प्रति उनका यह आकर्षण गहरे प्रेम में बदल गया। एक शाम, जब सूरज समंदर में डूब रहा था और आसमान नारंगी हो रहा था, कबीर ने अपना कैनवास सिमरन की तरफ घुमाया। उस पेंटिंग पर लिखा था क्या तुम मेरी जिंदगी का स्थायी सुर बनोगी? सिमरन मुस्कुराई और उसने अपनी सहमति जताते हुए कबीर के कंधे पर अपना सिर रख दिया। वह शाम उनके जीवन की सबसे हसीन शाम बन गई।

कांच के टुकड़े

खुद को समेटने की हर कोशिश बेकार हुई,
हाथों में फिर से वही पुराने ज़ख्म आए।
जिसको चाहा था शिद्दत से अपनी रूह में,
वही शख्स आज हमें अजनबी नज़र आए।

रूहानी एहसास

जिस्म का रिश्ता नहीं, रूह का नाता है तुमसे, हर जनम में बस यही रिश्ता निभाना है तुमसे। जब भी उदास होती है मेरी ये तन्हा रात, इक प्यारा सा ख्याल बनकर आ जाते हो तुम मुझसे।

अनकहा एहसास

लफ्ज कम पड़ जाते हैं जब तुम्हें देखते हैं, खामोश रहकर भी बहुत कुछ कहते हैं। यह रूह का मिलन है शायद हमारा, जो बिना छुए ही सब कुछ सहते हैं।