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कुल 7 परिणाम मिले खोज शब्द: अकेलेपन

धुंधली खिड़की से झांकता सूरज

सर्दी की ठंडी सुबह थी और बाहर घना कोहरा छाया हुआ था। अलोक अपनी खिड़की के पास बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। उसका मन पिछले कुछ महीनों से उपजे अकेलेपन से भारी था, क्योंकि उसका बेटा विदेश जा चुका था और पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत उसे नहीं मिली थी। तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी। अलोक ने दरवाजा खोला तो सामने एक छोटा सा पिल्ला ठंड से कांप रहा था, जिसे किसी ने उसकी देहरी पर छोड़ दिया था। पहले तो उसने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी मासूम आँखों को देखकर अलोक का दिल पिघल गया। उसने उसे अंदर बुलाया और गर्म दूध पिलाया। उस बेजुबान के आने से अलोक का सूना घर अचानक खिलखिला उठा। उसने महसूस किया कि प्यार और साथ पाने की कोई उम्र नहीं होती और जीवन किसी भी मोड़ पर नया सवेरा दिखा सकता है।
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खिड़की पर बैठा परिंदा

शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में अलोक अपने काम में इतना उलझ चुका था कि उसे प्रकृति की खूबसूरती देखने का वक्त ही नहीं मिलता था। पिछले कुछ दिनों से उसकी दफ्तर वाली खिड़की के पास एक घायल कबूतर आकर बैठ जाता था। शुरुआत में अलोक ने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी बेबस आँखें देखकर अलोक का दिल पिघल गया। वह रोज सुबह उस परिंदे के लिए दाना और पानी रखने लगा। धीरे-धीरे उस परिंदे के पंख ठीक होने लगे और वह थोड़ी देर उड़कर वापस उसी खिड़की पर आने लगा। इस रोजमर्रा के सिलसिले ने अलोक के अकेलेपन को पूरी तरह से मिटा दिया। उसे महसूस हुआ कि यह बेजुबान परिंदा उसे यह सिखाने आया था कि जिंदगी सिर्फ काम का नाम नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे जीवों की देखभाल करने में ही असली सुकून छुपा हुआ है।
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सांसों की उलझन

तेरी यादों का साया आज भी साथ चलता है,
अकेलेपन में हर जख्म चुपचाप जलता है।
जाने क्या बात थी उस जुदाई के लम्हे में,
कि आज भी हर लम्हा आंखों में आंसू भरता है।
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वक्त का फेर

वक्त ने सिखा दिया हमें अकेले चलना, अब किसी के आने जाने से फर्क नहीं पड़ता। जख्म इतने गहरे मिले हैं इस जिंदगी से, कि अब किसी मरहम पर भरोसा नहीं होता।
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