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कुल 138 परिणाम मिले खोज शब्द: सुबह

कांच का चमकता टुकड़ा

सड़क के किनारे पड़े कांच के एक साधारण टुकड़े पर जब सूरज की रोशनी पड़ी, तो वह किसी हीरे की तरह जगमगाने लगा। राह चलते कई लोग उसे कीमती हीरा समझकर उठाने के लिए दौड़े। एक लालची व्यापारी ने उसे झपट लिया और अपने घर ले जाकरजोरी में रख दिया। लेकिन सुबह होते ही उसकी चमक गायब हो गई क्योंकि वह केवल कांच का एक आम टुकड़ा था, जिसे धूप ने कुछ पलों के लिए खास बना दिया था। व्यापारी को तब समझ आया कि हर चमकती हुई चीज कीमती नहीं होती, और असली मूल्य तो आंतरिक गुणों का होता है, बाहरी दिखावे का नहीं।
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पहाड़ की चोटी पर

सुबह की पहली किरण के साथ ही राहुल ने अपने सफर की शुरुआत कर दी थी। लक्ष्य था उस विशाल पहाड़ की चोटी तक पहुँचना, जिसे आज तक कोई अकेला नहीं चढ़ पाया था। रास्ते में कंकड़-पत्थर और तेज ठंडी हवाएं उसका रास्ता रोक रही थीं। कई बार उसके पैर फिसले और उसे लगा कि अब आगे बढ़ना नामुमकिन है। लेकिन उसने पीछे मुड़कर देखने से इनकार कर दिया। हर कदम के साथ उसकी सांसें तेज हो रही थीं, पर हौसला और बुलंद होता जा रहा था। आखिरकार, सूरज ढलने से ठीक पहले वह चोटी पर जा पहुँचा। उसने चारों तरफ नजर घुमाई, नीचे बादलों का समंदर फैला हुआ था और ठंडी हवा उसके माथे को चूम रही थी। उस ऊंचाई पर खड़े होकर उसने महसूस किया कि कठिनाइयां सिर्फ हमें मजबूत बनाने के लिए आती हैं। मंजिल की वह जीत सारे दर्दों को पल भर में भुला देने के लिए काफी थी।
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सफलता का शिखर

अमित ने अपने छोटे से गांव से निकलकर महानगर की इस बड़ी कंपनी में इंटरव्यू दिया था। उसके पास महंगे कोट-पैंट नहीं थे, न ही अंग्रेजी का कोई भारी-भरकम अनुभव। उसके पास केवल उसकी मेहनत और मजबूत इरादे थे। पैनल के अधिकारी उसकी सादगी देखकर थोड़ा मुस्कुराए। अमित ने बिना किसी झिझक के अपने हुनर और सीखने की ललक के बारे में खुलकर बात की। उसने बताया कि कैसे अभावों में भी उसने अपने सपनों को जिंदा रखा है। इंटरव्यू के बाद हफ्तों तक कोई जवाब नहीं आया, तो उसका दिल बैठने लगा। उसे लगा कि शायद शहर की चकाचौंध में उसकी आवाज कहीं खो गई है। लेकिन तभी एक सुबह उसके फोन पर एक ईमेल आया, जिसमें उसे कंपनी का मुख्य प्रबंधक नियुक्त करने की बात कही गई थी। अमित की आँखों में खुशी के आंसू थे, उसने साबित कर दिया कि काबिलियत किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती।
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भोर का संगीत

पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे से गाँव में सुबह की शुरुआत चिड़ियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से होती थी। अनिरुद्ध शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी से तंग आकर कुछ दिनों के लिए इसी शांत गाँव में आया था। पहले दो दिन उसे यहाँ का सन्नाटा बहुत खला, क्योंकि वह शहर के कोलाहल का आदी हो चुका था। लेकिन तीसरे दिन भोर होते ही जब उसने खिड़की खोली, तो ताज़ी हवा के झोंके के साथ उसे प्रकृति का एक अलग ही संगीत सुनाई दिया। पेड़ों के पत्तों की सरसराहट और दूर बहते झरने की कलकल ने उसके मन के सारे तनाव को जैसे धो डाला। उसने महसूस किया कि असली सुकून भौतिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में बसता है। उस सुबह उसने अपनी डायरी निकाली और बिना किसी जल्दी के प्रकृति की सुंदरता को शब्दों में पिरोना शुरू कर दिया। शहर लौटने का उसका अब बिल्कुल मन नहीं था क्योंकि उसे अपनी खोई हुई आंतरिक शांति आखिरकार मिल चुकी थी।
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अंतिम चाय की प्याली

शहर के व्यस्त चौराहे पर रामू का छोटा सा चाय का खोखा था। उसकी विशेषता यह थी कि वह अपनी दुकान पर आने वाले हर निराश व्यक्ति को मुफ्त में अदरक वाली चाय पिलाता था और एक प्यारी सी सलाह देता था। लोग उसे 'चाय वाले बाबा' कहकर बुलाते थे क्योंकि उसकी बातें दिल को छू जाती थीं। एक ठंड की सुबह, दुकान पर एक युवा व्यवसायी आया जिसका हाल ही में सब कुछ डूब गया था। वह पूरी तरह टूट चुका था और उसकी आँखों में निराशा साफ झलक रही थी। रामू ने उसे गरमा-गरम चाय की प्याली बढ़ाई और मुस्कुराते हुए कहा कि रात चाहे जितनी भी लंबी क्यों न हो, सुबह का सूरज निकलने से उसे कोई नहीं रोक सकता। उस युवक ने चाय की चुस्की ली और रामू की इन साधारण सी बातों में उसे अपनी समस्याओं का समाधान मिल गया। वह युवक एक नई उम्मीद और ऊर्जा के साथ वहाँ से विदा हुआ। रामू का वह खोखा केवल चाय की दुकान नहीं, बल्कि हारे हुए दिलों के लिए एक सहारा बन चुका था।
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रेत पर बने पदचिह्न

सुबह के समय समुद्र तट पर टहलना सोहन का पुराना शौक था। वह रोज लहरों के साथ बहकर आने वाली सीपियों को देखता और अपने ख्यालों में खो जाता। एक दिन उसे रेत पर एक बहुत ही सुंदर और अनोखे आकार का पत्थर मिला। पत्थर पर प्राकृतिक रूप से एक फूल की आकृति उभरी हुई थी। सोहन ने सोचा कि यह किसी मूर्तिकार का अधूरा काम होगा जो लहरों में बहकर यहाँ आ गया। उसने उस पत्थर को अपनी जेब में रख लिया और घर लौट आया। घर आकर उसने जब उसे साफ किया, तो पाया कि उसके पीछे कुछ शब्द खुदे हुए थे। वे शब्द थे - जो तुम्हारा है, वह कभी न कभी तुम्हें ढूंढ ही लेगा। उस एक वाक्य ने सोहन के जीवन का नजरिया ही बदल दिया। उसे समझ आ गया कि सफलता और खुशी के लिए ज्यादा भागने की जरूरत नहीं होती, बस सही वक्त का इंतजार करना पड़ता है। आज सोहन हर सुबह उसी तट पर जाता है, लेकिन अब वह किसी चीज की तलाश नहीं करता, बल्कि जीवन के हर पल का आनंद लेता है।
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धुंधली खिड़की से झांकता सूरज

सर्दी की ठंडी सुबह थी और बाहर घना कोहरा छाया हुआ था। अलोक अपनी खिड़की के पास बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। उसका मन पिछले कुछ महीनों से उपजे अकेलेपन से भारी था, क्योंकि उसका बेटा विदेश जा चुका था और पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत उसे नहीं मिली थी। तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी। अलोक ने दरवाजा खोला तो सामने एक छोटा सा पिल्ला ठंड से कांप रहा था, जिसे किसी ने उसकी देहरी पर छोड़ दिया था। पहले तो उसने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी मासूम आँखों को देखकर अलोक का दिल पिघल गया। उसने उसे अंदर बुलाया और गर्म दूध पिलाया। उस बेजुबान के आने से अलोक का सूना घर अचानक खिलखिला उठा। उसने महसूस किया कि प्यार और साथ पाने की कोई उम्र नहीं होती और जीवन किसी भी मोड़ पर नया सवेरा दिखा सकता है।
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बंजर ज़मीन पर खिला गुलाब

गाँव के बुजुर्ग मोहन लाल ने जब उस सूखी और बंजर ज़मीन पर पौधे लगाने की सोची, तो पूरे गाँव ने उसका मजाक उड़ाया। लोगों का कहना था कि इस कंकड़-पत्थर वाली ज़मीन पर घास का एक तिनका भी नहीं उग सकता। लेकिन मोहन लाल की जिद के आगे कुदरत को भी झुकना पड़ा, वह रोज सुबह मीलों दूर से पानी ढोकर लाता और पौधों को सींचता। साल बीत गए, मोहन लाल की उम्र ढलने लगी और उसकी पीठ झुक गई, लेकिन उसकी मेहनत में कोई कमी नहीं आई। एक दिन जब भीषण गर्मी के बाद पहली बारिश हुई, तो उसी बंजर ज़मीन के बीचों-बीच एक लाल गुलाब खिल उठा। उस लाल गुलाब को देखकर पूरा गाँव हैरान रह गया और जिन लोगों ने कभी उसका मजाक उड़ाया था, वे आज उसके सामने नतमस्तक थे। मोहन लाल ने मुस्कुराते हुए अपनी झुर्रियों भरे हाथों से उस फूल को छुआ और समझ गया कि पक्की श्रद्धा और अटूट मेहनत से कुछ भी संभव है।
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पिता की पुरानी साइकिल की घंटी

सुबह के ठीक छह बजे जब भी गली में साइकिल की घंटी बजती थी, सोहन समझ जाता था कि उसके पिता काम से लौट आए हैं। वह घंटी सिर्फ एक साइकिल का हिस्सा नहीं थी, बल्कि उसके सुरक्षित बचपन का एक प्रतीक थी। समय बीता, पिता का साया उठ गया और वह पुरानी साइकिल जंग खाकर कबाड़ बन गई। सोहन ने उस साइकिल को कबाड़ में बेचने का फैसला किया और मैकेनिक को बुला लिया। जैसे ही मैकेनिक उसे ले जाने लगा, सोहन का बेटा दौड़कर आया और उसने उस टूटी हुई घंटी को निकाल कर अपने हाथ में रख लिया। उसने जैसे ही घंटी बजाई, उसकी आवाज़ ने सोहन के भीतर दबे बचपन के सारे अहसासों को फिर से जीवंत कर दिया। सोहन की आंखें भर आईं और उसने मैकेनिक को पैसे देकर साइकिल वापस रखवा ली। उस घंटी की खनक ने उसे याद दिलाया कि पिता कहीं नहीं गए, वे आज भी उसकी हर सुबह में मौजूद हैं।
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गुलाब के पौधे की देखभाल करती वृद्धा

वृद्धा आश्रम के कोने में बनी छोटी सी क्यारी में कमला जी रोज सुबह पानी डाला करती थीं। उनके पास इस दुनिया में अपना कहने के लिए कोई नहीं था, सिवाय इन गुलाब के पौधों के जिन्हें उन्होंने अपने हाथों से सींचा था। लोग कहते थे कि वे किस बात का इंतजार कर रही हैं, जब उनके अपने ही उन्हें यहाँ छोड़ गए हैं। लेकिन कमला जी की आँखों में शिकायत नहीं, बल्कि एक अजीब सी उम्मीद थी कि शायद कभी कोई अपना उनसे मिलने आएगा। एक दिन जब एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर उस क्यारी के पास आया और उसने एक फूल को छुआ, तो कमला जी के चेहरे पर बरसों बाद वैसी ही मुस्कान लौटी जैसी कभी उनके अपने बच्चों के होने पर हुआ करती थी। उस एक पल ने उनके सूनेपन को इस तरह भर दिया कि उन्हें लगा जैसे पूरी दुनिया की खुशियाँ उन्हें मिल गई हों।
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पिता का पुराना चमड़े का ब्रीफकेस

अलमारी के सबसे निचले हिस्से में धूल फांक रहा वह पुराना चमड़े का ब्रीफकेस आज बाहर निकला था। रोहन ने जब उसकी चेन खोली, तो अंदर से कुछ पुराने कागजात और एक टूटी हुई कलम निकली। यह वही ब्रीफकेस था जिसे उसके पिता रोज सुबह दफ्तर लेकर जाते थे और जिसके लौटने की आवाज सुनकर रोहन दौड़कर गेट पर पहुँच जाता था। उन दिनों रोहन को लगता था कि इस ब्रीफकेस में दुनिया भर की खुशियाँ और जरूरत का सामान बंद है। लेकिन वक्त बीतने के साथ रोहन खुद उसी दौड़ का हिस्सा बन गया, और पिता की मेहनत की कीमत उसे अब समझ आई जब वह खुद अपने बच्चों की जिम्मेदारियों में उलझ चुका था। उसने उस ब्रीफकेस को अपने सीने से लगा लिया और उसकी आँखों के सामने पिता का थका हुआ लेकिन मुस्कुराता चेहरा तैर गया। यह ब्रीफकेस सिर्फ चमड़े का थैला नहीं, बल्कि एक पिता के अंतहीन संघर्ष और त्याग की मूक दास्तान था।
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सपनों का नया सवेरा

सुबह की पहली किरण जब कमरे की खिड़की से अंदर आई, तो राहुल की आँखें खुल गईं। आज उसका इंटरव्यू था, जिसके लिए उसने महीनों से रात-दिन एक कर दिए थे। उसके पिता की साइकिल की दुकान से लेकर इस शहर के बड़े दफ्तर तक का सफर आसान नहीं था। अचानक रास्ते में उसकी स्कूटी खराब हो गई और उसे लगा कि आज सब खत्म हो गया है। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और दौड़कर समय पर दफ्तर पहुँच गया। जब इंटरव्यू के बाद उसे चयन का पत्र मिला, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती और हर नई सुबह एक नई उम्मीद लेकर आती है।
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