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स्टेशन की बेंच पर भूला हुआ छाता

बारिश की वह मूसलाधार शाम किसी को भी घरों में दुबकने पर मजबूर कर रही थी, सिवाय कबीर के जो आखिरी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। स्टेशन का वह पुराना शेड पानी की बौछार से पूरी तरह सुरक्षित नहीं था, फिर भी कबीर अपनी किताब में खोया हुआ था। तभी वहाँ एक लड़की आई, जिसके हाथ में एक नीला छाता था और चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री। उसने बिना कुछ कहे कबीर के पास वाली बेंच पर जगह ली और अपना गीला बैग ठीक करने लगी। ट्रेन आने में अभी एक घंटा बाकी था और दोनों के बीच चुप्पी पसरी हुई थी। अचानक जब ट्रेन की सिटी बजी, तो हड़बड़ी में लड़की अपना वही नीला छाता वहीं बेंच पर भूला कर डिब्बे में चढ़ गई। कबीर ने छाता उठाने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन चल पड़ी थी। अगले दिन कबीर उसी समय उसी बेंच पर बैठा था, शायद इस उम्मीद में कि वह लड़की अपना छाता लेने जरूर आएगी। और वाकई, थोड़ी देर बाद वही लड़की परेशान सी स्टेशन पर नजर आई। जब कबीर ने मुस्कुराते हुए उसे उसका छाता वापस किया, तो उसकी आँखों में जो राहत और चमक थी, उसने कबीर के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं। उस एक छाते ने दो अजनबियों को हमेशा के लिए एक अटूट रिश्ते में बांध दिया, जो बारिश की हर बूंद के साथ और गहरा होता चला गया।

पुरानी घड़ी की टिक-टिक

दादी की विरासत में मिली वह बड़ी सी दीवार घड़ी अब टिक-टिक करना बंद कर चुकी थी। विक्रम उसे ठीक कराने के लिए शहर के सबसे पुराने घड़ीसाज के पास पहुंचा। वहां उसकी मुलाकात नैना से हुई, जो अपनी पुश्तैनी घड़ियों को ठीक करवाने आई थी। दोनों घंटों उस दुकान में पुरानी घड़ियों की आवाज़ सुनते रहे और वक्त के पहिये के साथ उनकी बातें भी आगे बढ़ने लगीं। घड़ीसाज ने जब कहा कि वक्त को वापस नहीं लाया जा सकता, तो विक्रम ने नैना की आँखों में देखते हुए कहा कि कुछ लम्हें ऐसे होते हैं जो घड़ी की सुइयों को रोक देते हैं। उस दुकान की खामोशी में एक नया संगीत गूंज उठा था, जो ताउम्र उनके साथ रहने वाला था।

मद्धम रोशनी का दिया

दीवाली की जगमगाती शाम में पूरा शहर रोशनी से नहाया हुआ था, लेकिन तरुण के छोटे से मिट्टी के बर्तन की दुकान पर सन्नाटा पसरा था। इस बार उसकी बनाई गई दीये की कलाकृतियां बिक नहीं पाई थीं, जिससे उसका मन बहुत उदास था। वह अपनी अधूरी किस्मत को कोस रहा था कि तभी दुकान पर एक युवा लड़की ईशा आई। ईशा ने न सिर्फ तरुण के सारे दीये खरीद लिए, बल्कि उसकी कला की दिल खोलकर तारीफ भी की। तरुण की आँखों में चमक लौट आई और उसने ईशा को धन्यवाद देने के लिए एक विशेष दीया उपहार में दिया। अगले साल उसी दीवाली पर ईशा फिर से उस दुकान पर आई, लेकिन इस बार वह अकेلی नहीं थी, बल्कि तरुण के जीवन की हमसफर बनकर आई थी। दोनों ने मिलकर उस छोटी सी दुकान को एक बड़े हस्तशिल्प केंद्र में बदल दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि सच्चे प्यार का दिया जब एक बार जल जाए, तो उसकी रोशनी कभी फीकी नहीं पड़ती और हर अंधेरे को आसानी से हरा सकती है।

पुरानी हवेली की खिड़की

गाँव के छोर पर स्थित वह पुरानी हवेली सदियों पुरानी कहानियों की गवाह थी। कोई वहां जाने की हिम्मत नहीं करता था, सिवाय अक्षित के, जो उस हवेली के जीर्णोद्धार का काम संभाल रहा था। एक दिन काम के दौरान उसे धूल से सनी एक पुरानी डायरी मिली, जिसके पन्नों पर अंजलि नाम की किसी लड़की के खूबसूरत खत लिखे थे। वे खत आज से पचास साल पुराने थे, जो किसी ऐसे शख्स के लिए थे जो कभी उन तक पहुँच ही नहीं पाया। अक्षित उन खतों के शब्दों में इस तरह खो गया कि उसे हवेली से ज्यादा उन भावनाओं की फिक्र होने लगी। तभी एक दिन एक वृद्ध महिला अपनी पोती नैना के साथ उस हवेली को देखने आईं। वह महिला कोई और नहीं बल्कि उसी अंजलि की बेटी थीं, जो अपनी माँ की आखिरी इच्छा पूरी करने आई थीं। नैना और अक्षित जब मिले, तो दोनों को लगा कि वे सदियों से एक-दूसरे को जानते हैं। अतीत के उन पन्नों ने वर्तमान में दो अजनबी दिलों को हमेशा के लिए एक अटूट बंधन में बांध दिया।

किताबों की दुकान का कोना

शहर के एक पुराने कोने में बनी उस छोटी सी किताबों की दुकान में रोज शाम को अनमोल और सिमरन की मुलाकात होती थी। दोनों हमेशा एक ही किताब पर हाथ रखते और फिर हंसकर एक-दूसरे को पढ़ने के लिए वह पन्ना सौंप देते थे। कई महीनों तक यह सिलसिला खामोशी से चलता रहा और दोनों के बीच एक अनजाना सा रिश्ता बन गया। एक दिन दुकान के मालिक ने बताया कि यह दुकान अब बंद होने वाली है, जिससे दोनों मायूस हो गए। उस अंतिम शाम को अनमोल ने अपनी जेब से एक अंगूठी निकाली और सिमरन से पूछा कि क्या वह इस किताब के पन्नों से बाहर भी उसकी जिंदगी का हिस्सा बनेगी। सिमरन की आंखों में खुशी के आंसू आ गए और उसने तुरंत हां कह दिया।

नियम हमारे

जिंदगी के नियम हम खुद तय करते हैं,
औरों के इशारों पर तो कटपुतलियां नाचती हैं।
जो हमें झुकाने चला था खुद झुक गया,
ये हमारे तेवर की एक छोटी सी झलक है।

अंतिम पन्ना

किताब-ए-जिंदगी का एक और पन्ना मुड़ गया,
जो कल तक अपना था आज वो पीछे छूट गया।
ढूंढते रहे हम वजह इस दूरी की यारों,
वक्त बदला और हमारा हर सपना रूठ गया।

अंतिम विदाई

बिना कुछ कहे, बिना किसी शोर के चुपचाप जिंदगी से रुखसत हो गए वो, और हम पीछे छूट गए सिर्फ उनकी मीठी यादों और अनगिनत सवालों के सहारे।