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सांझ की देहरी पर इंतजार

सुलोचना जी रोज शाम को अपनी बालकनी में बैठकर सड़क के मोड़ को निहारा करती थीं। उनका बेटा दस साल पहले शहर नौकरी करने गया था और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फोन की घंटियां अब महीनों में बजती थीं और उनमें भी औपचारिकता अधिक होती थी। बूढ़ी आंखों में हर आने वाले शख्स का अक्स उनके बेटे जैसा लगता था। पड़ोस के बच्चे उन्हें दादी कहकर पुकारते और उनके साथ वक्त बिताते, जिससे उनका सूनापन थोड़ा कम हो जाता था। एक दिन जब बारिश तेज हो रही थी, तो दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुलोचना जी ने दरवाजा खोला तो सामने उनका बेटा खड़ा था, जिसने सामान फेंककर मां को गले से लगा लिया। उस एक पल ने वर्षों की दूरी और कड़वाहट को आंसुओं में बहा दिया।

रेलवे स्टेशन का आखिरी मुसाफिर

रात के दो बज चुके थे और मानसिंह अपनी आखिरी ट्रेन का इंतजार वीरान प्लेटफॉर्म पर कर रहा था। स्टेशन पर उसके अलावा कोई टिकट कलेक्टर भी नजर नहीं आ रहा था। तभी पटरियों पर लोहे की रगड़ खाने की भयानक आवाज गूंजी और एक पुरानी भाप इंजन वाली ट्रेन आकर रुक गई। डिब्बों की खिड़कियों से कोई रोशनी नहीं आ रही थी। जिज्ञासावश मानसिंह ने एक डिब्बे का दरवाजा खोला और अंदर कदम रखा। अचानक ट्रेन तेजी से चल पड़ी और अंदर बैठे सभी यात्री बिना चेहरे के काले साये निकले। उन्होंने मानसिंह को घेर लिया। सुबह जब पैसेंजर ट्रेन आई, तो मानसिंह उस पटरी से कई मील दूर बेहोश मिला, और उसके हाथ में उसी पुरानी ट्रेन का एक जंग लगा टिकट था।

अटेरी की पुरानी डायरी

विक्रम को अपने नए पुराने घर की अटारी में एक धूल भरी डायरी मिली। डायरी के पन्ने पलटने पर उसे पता चला कि उसमें जो भी भविष्य की घटनाएँ लिखी थीं, वे सच साबित हो रही थीं। उसने उत्सुकतावश आगे के पन्ने पढ़े और सन्न रह गया। उस पर लिखा था कि आज रात ठीक बारह बजे विक्रम का परछाई से सामना होगा और उसकी साँसें थम जाएंगी। विक्रम ने हंसकर डायरी बंद कर दी और रात होने का इंतजार करने लगा। जैसे ही घड़ी की सुई बारह पर पहुँची, कमरे की बत्तियाँ बुझ गईं और आईने में उसकी खुद की परछाई ने मुस्कुराकर उसका गला दबाना शुरू कर दिया।

रेगिस्तान के बीचों-बीच खड़ी हवेली

सड़कों से भटककर तीन दोस्त रात के समय रेगिस्तान के बीचों-बीच बने एक प्राचीन किले नुमा घर के पास पहुंचे। उन्होंने सोचा कि सुबह तक यहीं आराम किया जाए। घर के अंदर प्राचीन फर्नीचर और जलाई गई मोमबत्तियां देखकर उन्हें हैरानी हुई जैसे कोई उनका ही इंतजार कर रहा हो। तभी भारी लकड़ी का मुख्य दरवाजा अपने आप जोर से बंद हो गया और उसकी कुंडी लग गई। कमरों से अजीब सी फुसफुसाहट और हंसने की आवाजें आने लगीं। जब दोस्तों ने भागने की कोशिश की, तो रेत के टीले के बीच से कई साये उनकी तरफ बढ़ते हुए दिखाई दिए। सुबह होने पर वहां सिर्फ कुछ पुरानी हड्डियां और उनकी गाड़ी का टूटा हुआ पहिया मिला।

सुनहरा अवसर और आलसी युवक

एक छोटे से गाँव में सोहन नाम का एक युवक रहता था जो हमेशा अपनी किस्मत को कोसा करता था। वह सोचता था कि सफलता बिना किसी प्रयास के उसके दरवाजे पर चलकर आएगी। एक दिन गाँव के एक बुजुर्ग ने उसे एक जादुई बीज दिया और कहा कि इसे उपजाऊ मिट्टी में बोने से जीवन बदल जाएगा। सोहन ने बीज ले तो लिया, लेकिन उसे बोने में आलस किया और बस उसके उगने का इंतजार करने लगा। कुछ हफ्तों बाद जब बीज वैसे का वैसा ही रहा, तो उसे समझ आया कि बिना परिश्रम के कोई भी अवसर फलित नहीं हो सकता। उसने अपनी गलती से सीख ली और कड़ी मेहनत करना शुरू कर दिया, जिससे उसका जीवन पूरी तरह बदल गया।

स्टेशन की बेंच पर भूला हुआ छाता

बारिश की वह मूसलाधार शाम किसी को भी घरों में दुबकने पर मजबूर कर रही थी, सिवाय कबीर के जो आखिरी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। स्टेशन का वह पुराना शेड पानी की बौछार से पूरी तरह सुरक्षित नहीं था, फिर भी कबीर अपनी किताब में खोया हुआ था। तभी वहाँ एक लड़की आई, जिसके हाथ में एक नीला छाता था और चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री। उसने बिना कुछ कहे कबीर के पास वाली बेंच पर जगह ली और अपना गीला बैग ठीक करने लगी। ट्रेन आने में अभी एक घंटा बाकी था और दोनों के बीच चुप्पी पसरी हुई थी। अचानक जब ट्रेन की सिटी बजी, तो हड़बड़ी में लड़की अपना वही नीला छाता वहीं बेंच पर भूला कर डिब्बे में चढ़ गई। कबीर ने छाता उठाने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन चल पड़ी थी। अगले दिन कबीर उसी समय उसी बेंच पर बैठा था, शायद इस उम्मीद में कि वह लड़की अपना छाता लेने जरूर आएगी। और वाकई, थोड़ी देर बाद वही लड़की परेशान सी स्टेशन पर नजर आई। जब कबीर ने मुस्कुराते हुए उसे उसका छाता वापस किया, तो उसकी आँखों में जो राहत और चमक थी, उसने कबीर के दिल की धड़कनें बढ़ा दीं। उस एक छाते ने दो अजनबियों को हमेशा के लिए एक अटूट रिश्ते में बांध दिया, जो बारिश की हर बूंद के साथ और गहरा होता चला गया।

बरगद की छांव और पहला खत

बरगद के पुराने पेड़ के नीचे हर शाम आरव का इंतजार करना मीरा की आदत बन चुकी थी। वह हवा में उड़ते पत्तों को गिनती और सोचती कि क्या आज वह अपने दिल की बात कह पाएगा। पिछले तीन सालों से दोनों सिर्फ किताबों के आदान-प्रदान के बहाने मिलते थे, लेकिन खामोशियां बहुत कुछ कह जाती थीं। आज जब आरव आया, तो उसके हाथ में किताबों के साथ एक छोटा सा लिफाफा भी था। उसने वह लिफाफा मीरा की तरफ बढ़ाया और नजरें झुका लीं। मीरा ने कांपते हाथों से खत खोला, जिसमें बिना किसी प्रस्ताव के बस इतना लिखा था कि उसकी मौजूदगी ही आरव की दुनिया का सबसे खूबसूरत सच है। उस पल दोनों की आंखों में जो नमी थी, उसने सारे अधूरे शब्दों को पूरा कर दिया।

रोशनी की तलाश

अंधेरों से अब कोई डर नहीं लगता, क्योंकि उजाले से भी अब घर नहीं लगता। रोशनी के इंतजार में आंखें थक गई हैं, अब इन आंसुओं पर भी असर नहीं लगता।

बेपनाह चाहत

तुम्हारी हर एक बात से प्यार हो गया है हमें, इस दिल को किसी और का इंतज़ार नहीं रहा। बस तुम सामने रहो और वक्त थम जाए, हमारी जिंदगी का इसके सिवा कोई सपना नहीं रहा।