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माटी के दीये और उम्मीद की रात

दीपावली की रौनक हर तरफ थी, लेकिन कुम्हार मंगेश के घर में अंधेरा पसरा था। उसके बनाए हुए एक भी दीये इस बार नहीं बिके थे, क्योंकि लोग अब चाइनीज लड़ाइयों और मोमबत्तियों के दीवाने हो चुके थे। मंगेश मायूस होकर अपने चाक के पास बैठा सोच रहा था कि इस बार बच्चों को क्या जवाब देगा। तभी पड़ोस के छोटे से बच्चे ने आकर उसकी सारी उम्मीद जगा दी। उस बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो माटी के दीयों में ही होती है, मशीन के बने सामान में कहां जान होती है। बच्चे के उन मासूम शब्दों ने मंगेश के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी। उसने अपनी थकान भूला दी और फिर से दीयों को सजाने लगा। उस रात मंगेश के घर के दीये भले ही कम जले, लेकिन उसके दिल में जलती उम्मीद की लौ ने पूरे मोहल्ले को रोशन कर दिया था।

मिट्टी के दीये और उम्मीद की लौ

दीपावली की रात थी और पूरा शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा था। लेकिन शहर के एक कोने में बूढ़े मंगेश चाचा अभी भी अपनी टूटी हुई झोपड़ी के बाहर अंधेरे में बैठे मिट्टी के दीये बेच रहे थे। महंगाई के इस दौर में अब चाइनीज लड़ियों के आगे किसी को मिट्टी के दीये कहां भाते हैं। मंगेश चाचा की आँखें सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को देख रही थीं कि शायद कोई तो उनके बनाए दीये खरीदेगा ताकि घर में चूल्हा जल सके। तभी वहां एक छोटा बच्चा अपने माता-पिता के साथ आया और उसने चाचा की टोकरी के सारे दीये खरीदने की जिद पकड़ ली। बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो इन्हीं दीयों से होती है। उस बच्चे की बात सुनकर मंगेश चाचा के बुझते हुए दिल में उम्मीद की एक नया दीया जल उठा और उनकी आँखें खुशी से छलक आईं।

अल्मारी के कोने में रखी पुरानी घड़ी

दीपावली की सफाई के दौरान जब अनाहिता ने घर के पुराने स्टोर रूम की सफाई शुरू की, तो उसकी नजर लकड़ी की एक पुरानी संदूकची पर पड़ी। उसने धूल झाड़कर उसे खोला तो अंदर उसके दादाजी की कलाई पर बंधने वाली वह पुरानी टिक-टिक करती घड़ी मिली, जो सालों पहले बंद हो गई थी। अनाहिता ने उसे उठाया और जैसे ही उसने उसकी चाबी घुमाने की कोशिश की, अचानक से घड़ी की सुइयां हिलने लगीं और उसकी पुरानी टिक-टिक की आवाज गूंज उठी। उस आवाज के साथ ही बचपन की वे तमाम यादें ताजा हो गईं जब दादाजी उसे पार्क ले जाया करते थे और अपनी कलाई की घड़ी दिखाकर उससे समय पूछा करते थे। अनाहिता की पलकें नम हो गईं और उसने घड़ी को अपने सीने से लगा लिया। उस एक पल में बीता हुआ पूरा बचपन जैसे फिर से लौट आया हो।

एक साधारण दीपक का संकल्प

अंधेरे कमरे के एक कोने में रखे छोटे से मिट्टी के दीपक ने एक रात आसमान के तारों से कहा कि तुम बहुत भाग्यशाली हो जो पूरे ब्रह्मांड को रोशन करते हो। मेरा प्रकाश तो केवल इस छोटे से कमरे के एक कोने तक ही सीमित है। तब एक समझदार तारे ने मुस्कुराते हुए कहा कि तुम्हारा सोचना गलत है। हम आसमान में जरूर हैं, लेकिन किसी के अंधेरे को दूर नहीं कर सकते। तुम्हारी एक छोटी सी लौ इस पूरे कमरे के अंधकार को मिटाने की क्षमता रखती है। तुम छोटे जरूर हो, लेकिन तुम्हारा प्रभाव बहुत बड़ा है। यह सुनकर दीपक का आत्मविश्वास लौट आया और उसने पूरी शिद्दत से जलना शुरू कर दिया। यह कहानी हमें बताती है कि आपका दायरा भले ही छोटा हो, लेकिन आपका योगदान समाज के लिए अनमोल हो सकता है।

अंधेरे में जलता दीपक

घने जंगल के बीच एक छोटी सी कुटिया में एक संत रहते थे। उनके पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। एक शाम एक अहंकारी विद्वान उनके पास आया और व्यंग्य से पूछा कि आपके इस छोटे से दीपक से इस विशाल जंगल का अंधेरा कैसे दूर हो सकता है। संत ने बिना किसी क्रोध के बड़े शांत भाव से उत्तर दिया कि यह दीपक पूरे जंगल का अंधेरा भले ही न मिटा पाए, लेकिन यह मेरे आसपास के रास्ते को तो रोशन कर ही रहा है, जिससे मैं ठोकर खाने से बच जाता हूं। विद्वान संत का यह उत्तर सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे समझ आ गया कि बड़े बदलाव की शुरुआत हमेशा छोटे-छोटे कदमों से ही होती है। हमें दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपने हिस्से का प्रकाश खुद फैलाना चाहिए, तभी समाज में वास्तविक बदलाव संभव हो पाता है।

अंधेरे में उम्मीद की किरण

एक छोटे से गांव में एक गरीब लड़का रहता था जिसका नाम दीपक था। उसके पास पढ़ाई के लिए संसाधन नहीं थे, लेकिन उसके भीतर कुछ कर दिखाने की तीव्र इच्छा थी। वह हर रात गांव के एक खंभे के नीचे जलने वाले छोटे से बल्ब की रोशनी में अपनी पढ़ाई पूरी करता था। कई लोगों ने उसका मजाक उड़ाया कि वह कभी सफल नहीं हो पाएगा। लेकिन दीपक ने हार नहीं मानी और अपनी मेहनत जारी रखी। वर्षों बाद, वह अपनी कड़ी मेहनत के बल पर एक बड़ा अधिकारी बना और उसने अपने पूरे गांव में शिक्षा की रोशनी फैलाई। उसकी यह यात्रा साबित करती है कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी विपरीत हों, अगर आपका हौसला बुलंद है तो आप हर अंधेरे को चीरकर उजाला पा सकते हैं।

मिट्टी के दीये और साँझ का पहरा

दीपावली की शाम थी और पूरा गाँव रोशनी से जगमगा रहा था। सुमित अपने हाथों से बनाए मिट्टी के दीये बाज़ार में बेच रहा था, लेकिन उसकी उदासी इस बात से थी कि इस बार एक भी दीया नहीं बिका। तभी वहाँ अनघा आई, जिसने सुमित की आँखों में छिपी निराशा को भांप लिया। उसने बिना मोलभाव किए सारे दीये खरीद लिए और कहा कि असली रोशनी तो कला की कद्र करने में है। अनघा की इस सादगी ने सुमित के वीरान दिल में उम्मीद के कई दीये एक साथ जला दिए। उस शाम से अंधेरा दोनों की जिंदगी से हमेशा के लिए विदा हो गया और एक नया रिश्ता आकार लेने लगा।

मन का उजाला

दीपक पर जो छाया है उसे दूर भगाओ तुम, अपने भीतर ज्ञान का सूरज प्रज्वलित करो तुम। विचारों की शुद्धता ही जीवन का आधार है, सकारात्मक सोच से ही तो संसार पार है।