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बारिश की बूंदें और खिड़की

मीरा पिछले कई सालों से शहर की इस बड़ी इमारत की सातवीं मंजिल पर अकेली रहती थी, जहां बाहर का नजारा तो बहुत सुंदर था पर अपनापन नहीं था। जब भी आसमान में काले बादल छाते और तेज बारिश शुरू होती, तो वह अपनी खिड़की के पास बैठकर चुपचाप बूंदों को निहारती रहती। एक दिन मूसलाधार बारिश के दौरान उसकी खिड़की के शीशे पर एक छोटी सी चिड़िया आकर बैठ गई, जो ठंड से बुरी तरह कांप रही थी। मीरा ने बिना एक पल गंवाए खिड़की खोली और उस नन्हे मेहमान को अपने कमरे में लाकर तौलिए से सहलाया और दाना डाला। उस बेजुबान पक्षी के आने से मीरा का सूना घर अचानक चहक उठा और उसकी अकेली रातों का अकेलापन हमेशा के लिए छूमंतर हो गया।

धुंधली खिड़की से झांकता सूरज

सर्दी की ठंडी सुबह थी और बाहर घना कोहरा छाया हुआ था। अलोक अपनी खिड़की के पास बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। उसका मन पिछले कुछ महीनों से उपजे अकेलेपन से भारी था, क्योंकि उसका बेटा विदेश जा चुका था और पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत उसे नहीं मिली थी। तभी अचानक दरवाजे की घंटी बजी। अलोक ने दरवाजा खोला तो सामने एक छोटा सा पिल्ला ठंड से कांप रहा था, जिसे किसी ने उसकी देहरी पर छोड़ दिया था। पहले तो उसने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी मासूम आँखों को देखकर अलोक का दिल पिघल गया। उसने उसे अंदर बुलाया और गर्म दूध पिलाया। उस बेजुबान के आने से अलोक का सूना घर अचानक खिलखिला उठा। उसने महसूस किया कि प्यार और साथ पाने की कोई उम्र नहीं होती और जीवन किसी भी मोड़ पर नया सवेरा दिखा सकता है।

अंतिम पन्नों की दास्तान

अमित को अपने दादा जी की अलमारी से एक डायरी मिली जिसके आखिरी पन्ने पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं। दादा जी हमेशा कम बोलते थे और अपने कमरे में अकेले रहना पसंद करते थे, इसलिए अमित उन्हें कभी समझ नहीं पाया था। जब उसने डायरी के वो पन्ने पढ़े, तो उसे पता चला कि दादा जी ने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ परिवार को संवारने के लिए अपनी हर खुशी कुर्बान कर दी थी। यहाँ तक कि उन्होंने अपना पुश्तैनी मकान भी बच्चों की पढ़ाई के लिए बेच दिया था, पर कभी किसी को जुबान से शिकवा नहीं किया। अमित की आँखों से पछतावे के आंसू बहने लगे क्योंकि उसने कई बार अपने दादा जी से ऊंची आवाज में बात की थी। वह दौड़कर दादा जी के कमरे में गया, उन्हें कसकर गले लगा लिया और पहली बार उन्हें एहसास कराया कि वह उनसे कितना प्यार करता है।

खिड़की पर बैठा परिंदा

शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में अलोक अपने काम में इतना उलझ चुका था कि उसे प्रकृति की खूबसूरती देखने का वक्त ही नहीं मिलता था। पिछले कुछ दिनों से उसकी दफ्तर वाली खिड़की के पास एक घायल कबूतर आकर बैठ जाता था। शुरुआत में अलोक ने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी बेबस आँखें देखकर अलोक का दिल पिघल गया। वह रोज सुबह उस परिंदे के लिए दाना और पानी रखने लगा। धीरे-धीरे उस परिंदे के पंख ठीक होने लगे और वह थोड़ी देर उड़कर वापस उसी खिड़की पर आने लगा। इस रोजमर्रा के सिलसिले ने अलोक के अकेलेपन को पूरी तरह से मिटा दिया। उसे महसूस हुआ कि यह बेजुबान परिंदा उसे यह सिखाने आया था कि जिंदगी सिर्फ काम का नाम नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे जीवों की देखभाल करने में ही असली सुकून छुपा हुआ है।

दिल की बात

हर बात जुबान पर लाई नहीं जाती,
कुछ भावनाएं यूं ही समझी जाती हैं।
तुम जो पास हो तो डर कैसा,
यह दुनिया तो बस यूंही कही जाती है।

पत्थर की लकीर

हमारी जुबान और हमारे उसूल पत्थर की लकीर हैं,
बदलते वक्त के साथ हम अपने इरादे नहीं बदलते।
जो एक बार दिल से उतर गया,
फिर वो हमारी नजरों में दोबारा नहीं चढ़ता।

आंसुओं की भाषा

कभी-कभी आंखें वह सब कह जाती हैं जिसे जुबान छिपाने की लाख कोशिश करती है। हर बूंद में किसी अपने के दूर जाने का मौन इतिहास छिपा होता है।

खामोशियां

लबों पर हंसी सजाए रखते हैं सब के लिए, अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं अकेले। कोई तो समझे इस खामोशी की जुबान को, हम खुद से ही रोज बिछड़ते रहते हैं।

खामोशी की जुबानी

कभी-कभी खामोश रहना ही बेहतर होता है, हर बात को शब्दों में कहना मुमकिन नहीं होता है। जो दिल का दर्द समझ सके बिना कहे, वही शख्स अपना खास होता है।