बुद्धिमान शिल्पकार की मूर्ति
किसी नगर में एक बहुत ही प्रसिद्ध शिल्पकार रहता था जो बेहद सुंदर और जीवंत मूर्तियाँ बनाने के लिए जाना जाता था। उसकी बनाई हर मूर्ति में एक अद्भुत आकर्षण होता था जिससे लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। एक दिन उसके मन में अहंकार आ गया और उसे लगा कि उससे बेहतर कलाकार इस पूरी दुनिया में और कोई नहीं है। कुछ समय बाद एक वृद्ध साधु उसकी कार्यशाला में आए और उन्होंने शिल्पकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारी कला सचमुच अद्भुत है। लेकिन इसके साथ ही साधु ने यह भी कहा कि इन सुंदर मूर्तियों में एक छोटी सी कमी है जिसे केवल एक समझदार व्यक्ति ही पहचान सकता है। शिल्पकार को बहुत गुस्सा आया और उसने तुरंत पूछा कि मेरी कला में ऐसी कौन सी कमी हो सकती है। साधु मुस्कुराए और बोले कि अहंकार तुम्हारी इस कला की चमक को धीरे-धीरे खा रहा है। यह बात सुनकर शिल्पकार का घमंड चकनाचूर हो गया और उसे अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने साधु के चरणों में झुककर क्षमा माँगी और अपनी कला में विनम्रता को अपना मुख्य गुण बना लिया। इस प्रकार उसने समझा कि कला और जीवन दोनों में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता।
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