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शीशे की अलमारी में रखी किताब

लाइब्रेरी के एक कोने में शीशे की अलमारी के भीतर कैद वह लाल जिल्द वाली किताब धूल फांक रही थी। कोई भी पाठक पिछले कई दशकों से उसकी तरफ देखता तक नहीं था क्योंकि उसका कवर पूरी तरह फीका पड़ चुका था। मीना, जो किताबों की शौकीन थी, की नज़र एक दिन उस पर पड़ी। उसने लाइब्रेरियन से विशेष अनुमति लेकर उसे बाहर निकलवाया और पन्ने पलटने लगी। अंदर पहले ही पन्ने पर एक खूबसूरत हाथ से लिखा संदेश था जो किसी ने साठ साल पहले अपने किसी खास के लिए लिखा था। उस संदेश के साथ एक सूखा हुआ गुलाब का फूल भी दबा हुआ था जो अब कागज़ का हिस्सा बन चुका था। उस किताब ने मीना को अहसास कराया कि शब्द और भावनाएं कभी नहीं मरते, वे बस सही वक्त का इंतजार करते हैं।

अंधेरे कमरे की रोशनी

रमेश बाबू ने अपनी जीवनभर की कमाई से एक छोटा सा पुस्तकालय खोला था। उनका सपना था कि हर बच्चे के हाथ में किताब हो। शुरुआत में लोग उनकी इस पहल पर हंसे और बोले कि इस डिजिटल युग में कौन किताबें पढ़ेगा। रमेश बाबू निराश नहीं हुए। उन्होंने दुकान के बाहर एक बोर्ड लगाया जिस पर लिखा था, आओ और केवल बैठ कर पढ़ो, पैसे की कोई बात नहीं। धीरे-धीरे बच्चे आने लगे। एक दिन एक ऐसा लड़का आया जो हमेशा गुमसुम रहता था। उसने एक विज्ञान की किताब उठाई और उसकी आँखें चमक उठीं। उस दिन रमेश बाबू को समझ आया कि अंधेरे कमरे में एक दिया भी बहुत होता है।

अनोखा उपहार और सच्ची मुस्कान

सोनू बहुत ही अमीर घराने का बच्चा था जिसे उसके जन्मदिन पर हर साल महंगे खिलौने मिलते थे। इस बार उसने अपने जन्मदिन पर शहर के गरीब बच्चों के साथ अपनी खुशियाँ बांटने का अनोखा फैसला किया। उसने अपनी पुरानी मगर अच्छी किताबें और खिलौने उन जरूरतमंद बच्चों में बांट दिए। जब उसने एक छोटे बच्चे के चेहरे पर अपनी पुरानी खिलौना गाड़ी पाकर खुशी की चमक देखी, तो उसे जो सुकून मिला वह किसी भी नए खिलौने से नहीं मिल सकता था। उस दिन सोनू को समझ आया कि अपनी चीजें बांटने से मिलने वाली खुशी सबसे बड़ी होती है।

पुरानी किताबों की महक और तुम

शहर के उस पुराने पुस्तकालय में किताबों की महक के बीच मेरी आँखें अक्सर एक पन्ने की तलाश में भटक जाती थीं। तुम रोज उस कोने वाली मेज पर बैठकर उपन्यास पढ़ा करती थीं और मैं तुम्हें छुपकर देखता था। एक दिन तुमने अपनी डायरी मेरे पास भूल दी, और उस डायरी ने हमारे बीच की खामोशी को हमेशा के लिए तोड़ दिया। आज हम दोनों साथ हैं, लेकिन जब भी किताबों के पन्ने पलटता हूँ, पहला दिन ताजा हो जाता है।

किताबों की दुकान का कोना

शहर के एक पुराने कोने में बनी उस छोटी सी किताबों की दुकान में रोज शाम को अनमोल और सिमरन की मुलाकात होती थी। दोनों हमेशा एक ही किताब पर हाथ रखते और फिर हंसकर एक-दूसरे को पढ़ने के लिए वह पन्ना सौंप देते थे। कई महीनों तक यह सिलसिला खामोशी से चलता रहा और दोनों के बीच एक अनजाना सा रिश्ता बन गया। एक दिन दुकान के मालिक ने बताया कि यह दुकान अब बंद होने वाली है, जिससे दोनों मायूस हो गए। उस अंतिम शाम को अनमोल ने अपनी जेब से एक अंगूठी निकाली और सिमरन से पूछा कि क्या वह इस किताब के पन्नों से बाहर भी उसकी जिंदगी का हिस्सा बनेगी। सिमरन की आंखों में खुशी के आंसू आ गए और उसने तुरंत हां कह दिया।