संगीत के सुरों में सजा इकरार
संगीत अकादमी के रियाज कक्ष में हमेशा साजिंदों की गूंज रहती थी। मुझे बांसुरी बजाने का शौक था और आरोही को शास्त्रीय गायन का। हम दोनों अक्सर अपनी धुनें एक-दूसरे को सुनाते थे। एक दिन अकादमी के वार्षिक उत्सव से ठीक पहले मेरा बांसुरी अचानक टूट गया और मैं घबरा गई। आरोही ने आगे बढ़कर अपनी धुन से मेरा साथ दिया और उस दिन का कार्यक्रम बेहद सफल रहा। मंच पर जब तालियों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी, तब उसने मेरे कान में धीरे से कुछ ऐसा कहा जिसने मेरे सारे डर दूर कर दिए। उस संगीत के मंच पर हमारे सुरों के साथ-साथ हमारे दिल भी हमेशा के लिए एक हो गए।
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