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लोहे के पुल पर खड़ा संगीतकार

शहर के पुराने लोहे के पुल पर हर शाम एक बूढ़ा संगीतकार अपने फटे पुराने हारमोनियम के साथ आकर बैठ जाता था। उसके सुरों में एक ऐसा जादू था जो राह चलते लोगों के कदम रोक लेता था। उस शाम आसमान में काले बादल घिरे थे और तेज ठंडी हवा चल रही थी। संगीतकार की उंगलियां ठंड से कांप रही थीं, फिर भी उसने अपना वाद्य यंत्र नहीं छोड़ा। तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया और उसने अपनी गुल्लक से निकाले गए कुछ सिक्के संगीतकार की झोली में डाल दिए। बच्चे की आंखों में एक अनोखी चमक थी जो संगीतकार के सूनेपन को चीर गई। उस पल बूढ़े कलाकार को ऐसा महसूस हुआ मानो उसकी बरसों की साधना सफल हो गई हो। उसने अपनी आंखें बंद कीं और पुल के सन्नाटे में एक नया, जीवंत राग छेड़ दिया, जिसने उस सर्द शाम को हमेशा के लिए अमर बना दिया।
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अंधेरे कमरे का चिराग

शहर से दूर एक छोटे से गांव में मास्टर जी हर शाम को गांव के गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए एक दीया जलाया करते थे। चारों तरफ बिजली न होने के कारण अंधेरा रहता था, लेकिन उस छोटे से दीये की रोशनी में बच्चे बड़े चाव से पढ़ाई करते थे। एक दिन तेज आंधी के कारण दीया बुझ गया और चारों तरफ घनघोर अंधेरा छा गया, जिससे बच्चे उदास हो गए। तब मास्टर जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि असली रोशनी किताबों के ज्ञान से आती है जो कभी नहीं बुझती। बच्चों ने लालटेन की रोशनी में फिर से पढ़ना शुरू कर दिया और अपनी मेहनत से गांव का भविष्य बदल दिया।
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बगिया का आखिरी फूल

गांव के एक कोने में बने पुराने घर के आंगन में एक सुंदर सा गुलाब का पौधा था जिसकी देखभाल दादाजी वर्षों से करते थे। समय के साथ दादाजी की सेहत बिगड़ने लगी और वे उस पौधे को ज्यादा समय नहीं दे पाए, जिससे उस पर सिर्फ एक ही आखिरी फूल बचा था। सबको लगा कि अब यह पौधा सूख जाएगा और यह फूल भी मुरझा जाएगा। लेकिन पोते ने अपने दादाजी के प्यार को जीवित रखने के लिए उस पौधे की रोजाना खुद सिंचाई करनी शुरू कर दी। उसकी मेहनत रंग लाई और न केवल वह आखिरी फूल खिला रहा, बल्कि पौधे पर नए कोपल भी फूट पड़े।
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रेगिस्तान का सुनहरा सफर

दूर तक फैले धोरों के बीच एक अकेला ऊंट और उसका मालिक अपनी यात्रा पर थे। सूरज की तेज किरणें रेत को सोने की तरह चमका रही थीं और हवा में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। कई दिनों के सफर के बाद पानी की तलाश में दोनों की हिम्मत टूटने लगी थी। अचानक उस बुजुर्ग ने अपनी लाठी रेत में गाड़ी और कुछ दूर आगे बढ़ने को कहा। उस दिशा में आगे बढ़ने पर उन्हें मीठे पानी का एक छिपा हुआ प्राकृतिक सोता मिल गया, जिसने उनकी जान बचा ली। इस घटना ने उन्हें सिखाया कि कठिन समय में भी उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि मंजिल बस थोड़ी ही दूर होती है।
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मिट्टी के खिलौने और बचपन की खुशबू

सावन का महीना था और चारों तरफ गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू फैली हुई थी। गाँव के एक छोटे से कोने में रामू भैया चाक पर बैठ कर बड़े चाव से मिट्टी के खिलौने बना रहे थे। उनके हाथ बिना किसी मशीन के जादू की तरह चलते थे और देखते ही देखते घोड़ी, हाथी और सुंदर गुड़िया तैयार हो जाती थी। बच्चे हमेशा उनकी दुकान के बाहर जमा रहते थे, आँखों में चमक लिए। रामू कभी किसी बच्चे को खाली हाथ नहीं लौटाते थे, भले ही उसके पास पैसे हों या न हों। एक दिन एक शहर से आया अमीर व्यक्ति उनकी दुकान पर रुका। उसने उन खिलौनों की सादगी देखकर हैरानी जताई और सारे खिलौने एकमुश्त खरीदने की इच्छा जताई। उसने रामू को मुंहमांगी कीमत देनी चाही ताकि वह उन्हें शहर के बड़े शोरूम में बेच सके। रामू कुछ पल के लिए शांत हो गए। उन्होंने अपने गंदे और थके हाथों को देखा, फिर उन बच्चों के चेहरों को जो दूर खड़े होकर डरे हुए थे कि अब वे कभी खिलौने नहीं देख पाएंगे। रामू ने शहर वाले व्यक्ति को मना कर दिया। उन्होंने कहा कि ये खिलौने सिर्फ मिट्टी के नहीं हैं, इन पर इन बच्चों की मासूम हंसी और मेरे बरसों का सुकून टिका है, जिसे खरीदा नहीं जा सकता। शहर वाला व्यक्ति हैरान लौट गया और रामू के चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान बिखर गई।
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कागज की नाव और उम्मीद

सावन के महीने में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से गलियों में पानी भर गया था। मोहल्ले के सारे बच्चे अपने घरों की छतों से कागज़ की नावें बनाकर नीचे बहते पानी में छोड़ रहे थे। छोटा अभी एक कोने में खड़ा होकर अपनी बनाई हुई सबसे सुंदर नाव को देख रहा था। उसने उस पर नीले रंग से एक उम्मीद शब्द भी लिखा था। जैसे ही उसने उसे पानी में उतारा, एक तेज लहर के साथ वह नाव बाकी नावों से आगे निकल गई। कुछ दूर जाकर वह एक पत्थर से टकराकर रुक गई। अभी का दिल बैठ गया, लेकिन तभी एक छोटी सी चिड़िया आई और अपनी चोंच से उस नाव को हल्का सा धक्का देकर आगे बढ़ा दिया। अभी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। उसने समझ लिया कि मुश्किलें चाहे जितनी भी बड़ी हों, मदद किसी न किसी रूप में आ ही जाती है।
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