शाम की चौखट
सूरज ढल रहा था और पुरानी हवेली के सामने वाली चाय की दुकान पर लोगों की भीड़ कम हो रही थी। कबीर हर शाम अपनी साइकिल वहीं रोकता था क्योंकि उसे पता था कि उस वक्त शिखा अपनी बालकनी से पौधे को पानी देने जरूर आएगी। दोनों के बीच सिर्फ नजरों का संवाद होता था, जो शब्दों से कहीं ज्यादा बयां कर देता था। एक दिन हवा इतनी तेज चली कि शिखा के हाथ से गमला छूटकर नीचे गिरने ही वाला था कि कबीर ने फुर्ती से आगे बढ़कर उसे थाम लिया। उस मामूली सी घटना ने दोनों के बीच के सारे संकोच को तोड़ दिया और पहली बार उनके बीच सीधी बातचीत हुई। ढलते सूरज की रोशनी में दोनों ने महसूस किया कि उनका यह मौन प्यार अब एक मुखर हकीकत बन चुका था।
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