कागज़ की कश्तियाँ
बरसात की पहली बूँद ने सूखी मिट्टी को महका दिया था। कॉलेज के गलियारे में अहान और मीरा अपने नोट्स बचाते हुए एक कैंटीन के शेड के नीचे आकर खड़े हो गए। दोनों के बीच ज़्यादा बातचीत नहीं थी, बस एक अनकही सी खामोश पहचान थी जो पिछले कुछ महीनों से पनप रही थी। अचानक अहान ने अपनी जेब से एक पुराना कागज़ निकाला और फुर्ती से एक छोटी सी नाव बना डाली। उसने उसे पानी की बहती धारा में छोड़ते हुए कहा कि हमारी उम्मीदें भी इसी नाव जैसी हैं, जो हर लहर से लड़कर आगे बढ़ती हैं। मीरा मुस्कुराई और उसने अपनी किताब से एक सूखा पत्ता निकालकर उस नाव पर रख दिया। उस छोटे से पल ने दोनों के दिलों के फासलों को हमेशा के लिए मिटा दिया और एक नए रिश्ते की खूबसूरत शुरुआत हुई।
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