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कुल 143 परिणाम मिले खोज शब्द: वक्त

रेलवे क्रॉसिंग का इंतजार

शाम के वक्त जब फाटक बंद होता है, तो वाहनों की लंबी कतार लग जाती है। मोहन रोज़ इसी समय अपनी स्कूटी पर बैठकर ट्रेन के गुजरने का इंतज़ार करता है। आज भी वह वहीं खड़ा था, तभी उसकी नज़र एक बूढ़े व्यक्ति पर पड़ी जो बड़े प्यार से पटरी के उस पार देख रहा था। मोहन ने पूछा कि बाबा आप किसे देख रहे हैं। उस बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए बताया कि इसी ट्रेन से बरसों पहले उनका बेटा शहर गया था जो आज तक नहीं लौटा, लेकिन हर शाम उनका दिल कहता है कि वह शायद आज वापस आ जाएगा। यह सुनकर मोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने महसूस किया कि इंतज़ार सिर्फ एक समय की बात नहीं है, बल्कि यह किसी की उम्मीद और जीवन का वो धागा है जो कभी कमज़ोर नहीं पड़ता। उस दिन से मोहन का नज़रिया बदल गया।
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रेलवे स्टेशन का वह अंतिम पत्र

प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी गूंज रही थी और आलोक के हाथ में एक मुड़ा हुआ लिफाफा था। यह लिफाफा उसकी छोटी बहन ने उसे तब दिया था जब वह सालों पहले घर छोड़कर शहर आया था। उस समय गुस्से में उसने इसे पढ़ा तक नहीं था और अपनी बैग की सबसे निचली तह में दबा दिया था। आज जब वह अपने पैतृक घर लौट रहा था, पुरानी अलमारी समेटते वक्त उसे यह पत्र मिला। जैसे ही उसने लिफाफा फाड़ा, अंदर से कुछ सूखे हुए चमेली के फूल और बहन के सुंदर अक्षरों में लिखा संदेश निकला। बहन ने लिखा था कि चाहे रास्ते कितने भी अलग क्यों न हो जाएं, भाई का दरवाजा हमेशा उसके लिए खुला रहेगा। उस एक पन्ने ने आलोक की आंखें खोल दी और उसका सारा अहंकार एक पल में पिघल गया। वह ट्रेन से उतरते ही सीधा अपनी बहन के घर की तरफ दौड़ पड़ा, जहां सदियों का सूनापन प्यार की एक झप्पी में बदल गया।
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पिता का पुराना चमड़े का ब्रीफकेस

अलमारी के सबसे निचले हिस्से में धूल फांक रहा वह पुराना चमड़े का ब्रीफकेस आज बाहर निकला था। रोहन ने जब उसकी चेन खोली, तो अंदर से कुछ पुराने कागजात और एक टूटी हुई कलम निकली। यह वही ब्रीफकेस था जिसे उसके पिता रोज सुबह दफ्तर लेकर जाते थे और जिसके लौटने की आवाज सुनकर रोहन दौड़कर गेट पर पहुँच जाता था। उन दिनों रोहन को लगता था कि इस ब्रीफकेस में दुनिया भर की खुशियाँ और जरूरत का सामान बंद है। लेकिन वक्त बीतने के साथ रोहन खुद उसी दौड़ का हिस्सा बन गया, और पिता की मेहनत की कीमत उसे अब समझ आई जब वह खुद अपने बच्चों की जिम्मेदारियों में उलझ चुका था। उसने उस ब्रीफकेस को अपने सीने से लगा लिया और उसकी आँखों के सामने पिता का थका हुआ लेकिन मुस्कुराता चेहरा तैर गया। यह ब्रीफकेस सिर्फ चमड़े का थैला नहीं, बल्कि एक पिता के अंतहीन संघर्ष और त्याग की मूक दास्तान था।
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अक्सर छूट जाते हैं कुछ अपने

रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी बजते ही आरव की निगाहें भीड़ में उस चेहरे को तलाशने लगीं जिसके बिना उसने कभी सफर नहीं किया था। पिछले दस सालों से हर सुख-दुःख में साए की तरह साथ निभाने वाला उसका दोस्त कबीर आज नौकरी के सिलसिले में दूसरे देश जा रहा था। दोनों के बीच हमेशा अनगिनत बातें होती थीं, लेकिन आज विदाई के वक्त दोनों के हलक सूख चुके थे। ट्रेन चलने लगी और कबीर ने खिड़की से हाथ बाहर बढ़ाया। आरव ने दौड़कर उसका हाथ थाम लिया, और उसी पल दोनों की आंखों से बह निकले आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो दिए। फासले चाहे जितने भी बढ़ जाएं, कुछ रिश्ते समय और दूरी की सीमाओं से बहुत परे होते हैं।
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चाय के कप और अनकही बातें

ऑफिस की व्यस्त दिनचर्या से वक्त निकालकर हम दोनों उस नुक्कड़ की पुरानी चाय की दुकान पर बैठे थे। कई सालों बाद हुई इस मुलाकात में शुरुआत में शब्दों की भारी कमी महसूस हो रही थी। कुल्हड़ में चाय की भाप उठ रही थी और दोनों तरफ एक अजीब सा संकोच पसरा हुआ था। फिर अचानक किसी पुरानी बात पर एक हल्की सी हंसी गूंजी और सारी दूरियां एक पल में पिघल गईं। वक्त ने हमारे चेहरे पर भले ही लकीरें खींच दी हों, लेकिन दिलों का रिश्ता आज भी पहले जैसा ही गहरा था। चाय का आखिरी घूंट लेते हुए हमने वादा किया कि अब इतनी लंबी खामोशी फिर कभी नहीं होगी।
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रेडियो की खड़खड़ाहट और पुराना संगीत

पुरानी लकड़ी की अलमारी के पीछे छुपा हुआ वह ट्रांजिस्टर रेडियो सालों बाद आज अचानक मिल गया था। उसके एंटीना पर धूल की एक मोटी परत जमी थी और बैटरी का डिब्बा पूरी तरह जंग खा चुका था। जैसे ही मैंने उसे साफ करके चालू किया, एक जानी-पहचानी धुन कमरे में गूंज उठी। यह वही संगीत था जिसे सुनकर हम दोनों ने कभी भविष्य के सुनहरे सपने बुने थे। वक्त ने दूरियां बढ़ा दीं और रास्ते जुदा हो गए, लेकिन उस सुरीली आवाज ने अतीत के सारे पन्ने पलटा दिए। अब हवा में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक मीठी सी खामोशी थी जो दिल को सुकून दे रही थी।
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पुरानी छत और नए सपने

शहर की चकाचौंध से दूर जब मैं अपने पुस्तैनी घर लौटा, तो छत की ईंटें मुझे अपनी दास्तान सुनाने लगीं। यहीं बैठकर कभी मैंने खुले आसमान में ऊंचे उड़ने के सपने देखे थे। वक्त के साथ जिम्मेदारियों के बोझ ने उन सपनों को कहीं पीछे छोड़ दिया था। आज जब मैंने धूल जमी छत पर कदम रखा, तो बचपन की पतंगबाजी की यादें ताजा हो गईं। मेरे बेटे ने मेरे हाथ में एक कच्ची डोर थमाई और खुद पतंग आसमान में लहराने लगा। उस उड़ती हुई पतंग को देखकर मुझे एहसास हुआ कि सपने कभी मरते नहीं, बस उनका रंग बदल जाता है। पुरानी छत ने मुझे मेरे बचपन से दोबारा मिला दिया और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई।
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बक्से में बंद ख्वाब

मीरा ने जब घर की सफाई के दौरान अलमारी के सबसे निचले हिस्से में लकड़ी का वह पुराना बक्सा खोला, तो धूल की एक परत के साथ कई दबे हुए अरमान भी बाहर आ गए। उस बक्से में उसके कॉलेज के दिनों के स्केच, अधूरे गीत और कुछ रंग-बिरंगे धागे थे। एक वक्त था जब वह चित्रकार बनना चाहती थी, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों और सामाजिक बंधनों ने उसके सारे सपने एक बक्से में कैद करवा दिए। उसने उन कागजों को अपने हाथों से छुआ और उसकी आँखें नम हो गईं। तभी उसकी पोती दौड़ती हुई आई और उसने मीरा के पुराने रंगों को देखकर पेंटिंग बनाने की जिद पकड़ ली। मीरा ने अपनी पोती का हाथ थामा और ब्रश उठाया, मानो उसका टूटा हुआ सपना आज किसी नई रोशनी के साथ फिर से जिंदा हो उठा हो।
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खिड़की पर बैठा परिंदा

शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में अलोक अपने काम में इतना उलझ चुका था कि उसे प्रकृति की खूबसूरती देखने का वक्त ही नहीं मिलता था। पिछले कुछ दिनों से उसकी दफ्तर वाली खिड़की के पास एक घायल कबूतर आकर बैठ जाता था। शुरुआत में अलोक ने उसे भगाना चाहा, लेकिन उसकी बेबस आँखें देखकर अलोक का दिल पिघल गया। वह रोज सुबह उस परिंदे के लिए दाना और पानी रखने लगा। धीरे-धीरे उस परिंदे के पंख ठीक होने लगे और वह थोड़ी देर उड़कर वापस उसी खिड़की पर आने लगा। इस रोजमर्रा के सिलसिले ने अलोक के अकेलेपन को पूरी तरह से मिटा दिया। उसे महसूस हुआ कि यह बेजुबान परिंदा उसे यह सिखाने आया था कि जिंदगी सिर्फ काम का नाम नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे जीवों की देखभाल करने में ही असली सुकून छुपा हुआ है।
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पहली बारिश का पहला खत

आसमान में काले बादल छाए थे और मिट्टी की सौंधी खुशबू हवा में घुल रही थी। कॉलेज के दिनों में लिखी गई एक पुरानी डायरी के पन्नों को पलटते समय अनामिका को एक मोड़ पर मिला वह गुलाब का सूखा हुआ फूल मिल गया। उसके साथ एक खत था जो उसने कभी किसी को नहीं भेजा था, डर था कि कहीं रिश्ता न टूट जाए। आज जिंदगी के इस पड़ाव पर जब सब कुछ पा लेने के बाद भी कुछ अधूरा सा लगता था, उसने उस खत को दोबारा पढ़ा। उसने सोचा कि क्यों न आज अपने पुराने मित्र को फोन करके हालचाल पूछा जाए जिसके बिना कभी एक पल भी नहीं कटता था। जैसे ही उसने नंबर मिलाया, दूसरी तरफ से वही पुरानी जानी-पहचानी आवाज गूंजी, मानो वक्त वहीं का वहीं ठहर गया हो।
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सांझ की देहरी पर इंतजार

सुलोचना जी रोज शाम को अपनी बालकनी में बैठकर सड़क के मोड़ को निहारा करती थीं। उनका बेटा दस साल पहले शहर नौकरी करने गया था और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फोन की घंटियां अब महीनों में बजती थीं और उनमें भी औपचारिकता अधिक होती थी। बूढ़ी आंखों में हर आने वाले शख्स का अक्स उनके बेटे जैसा लगता था। पड़ोस के बच्चे उन्हें दादी कहकर पुकारते और उनके साथ वक्त बिताते, जिससे उनका सूनापन थोड़ा कम हो जाता था। एक दिन जब बारिश तेज हो रही थी, तो दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुलोचना जी ने दरवाजा खोला तो सामने उनका बेटा खड़ा था, जिसने सामान फेंककर मां को गले से लगा लिया। उस एक पल ने वर्षों की दूरी और कड़वाहट को आंसुओं में बहा दिया।
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बचपन की वह नीली साइकिल

गरीबी के दिनों में सोहन का एकमात्र सपना एक नीली साइकिल खरीदने का था। उसके पिता ने दिन-रात मेहनत करके जैसे-तैसे पैसे जोड़े और उसके जन्मदिन पर उसे वही साइकिल तोहफे में दी। सोहन की खुशी का ठिकाना नहीं था, उसने उस साइकिल को हमेशा अपनी जान से ज्यादा संभाला। वक्त बदला, सोहन बड़ा हुआ और शहर की एक नामी कंपनी में अफसर बन गया। आज उसके पास बड़ी गाड़ियां हैं, लेकिन जब भी वह पुरानी साइकिल को गैराज में देखता है, उसे अपने पिता के माथे का वह पसीना याद आ जाता है जो उन्होंने उसकी खुशी के लिए बहाया था। भौतिक सुखों से परे उस साइकिल में उसके पिता का आशीर्वाद और त्याग बसता था।
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