घड़ी की सुई और उम्मीद
अजय की घड़ी की टिक-टिक उसकी धड़कनों के साथ चल रही थी। इंटरव्यू का वक्त नजदीक आ रहा था और ट्रैफिक जाम ने उसकी सारी योजना पर पानी फेर दिया था। वह ऑटो से उतरकर बारिश के बीच पैदल ही दौड़ पड़ा क्योंकि यह नौकरी उसके परिवार के भविष्य के लिए बेहद जरूरी थी। कीचड़ में उसके जूते सन चुके थे और सांस फूल रही थी लेकिन हार मानने का सवाल ही नहीं था। जब वह ऑफिस के गेट पर पहुंचा, तो घड़ी ने ठीक इंटरव्यू का आखिरी मिनट दिखाया। रिसेप्शनिस्ट ने उसे अंदर जाने से मना कर दिया क्योंकि कड़ा नियम था। तभी कंपनी के मालिक ने उसे आते देख लिया और उसके संघर्ष भरे चेहरे को पढ़कर अंदर बुला लिया। मेहनत और समय की पाबंदी ने आखिरकार उसकी किस्मत का दरवाजा खोल ही दिया।
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