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रात की खामोशी

शहर की चकाचौंध से दूर एक छोटे से कमरे में बैठा कलाकार अपनी तूलिका से कागज़ पर रंगों को उकेर रहा था। रात का सन्नाटा चारों तरफ पसरा हुआ था और घड़ी की टिक-टिक के अलावा कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। उसे अपनी इस कला पर वर्षों से संदेह था कि क्या उसकी पेंटिंग्स कभी किसी को समझ आएंगी या नहीं। अचानक बाहर बारिश शुरू हो गई और ठंडी हवा का एक झोंका कमरे के खुले दरवाजे से अंदर आया। उसने अपनी अधूरी पेंटिंग पर नजर डाली और एक नया रंग भरकर उसे अंतिम रूप दिया। सुबह जब सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आई, तो उसने देखा कि उसकी वह साधारण सी पेंटिंग किसी जादुई कलाकृति जैसी चमक रही थी। उस पल उसे समझ आया कि कला को दूसरों की स्वीकृति की नहीं, बल्कि सच्चे समर्पण की आवश्यकता होती है।

अंधेरे कोने का दिया

दीवाली की रात पूरा शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा था। शहर के सबसे पुराने और वीरान कोने में एक छोटा सा घर था, जहाँ बुजुर्ग दीनानाथ अकेले रहते थे। उनके पास दीये खरीदने के भी पैसे नहीं थे, इसलिए उन्होंने घर के कोने में सिर्फ एक पुराना मिट्टी का दीया जला रखा था। रास्ते से गुजरने वाले लोग उस वीरान घर को देखकर आगे बढ़ जाते थे। तभी पड़ोस के कुछ बच्चे हाथों में मिठाइयां और ढेरों दीये लेकर दीनानाथ के दरवाजे पर आ पहुंचे। उन्होंने न केवल उस बुजुर्ग के घर को रोशन किया, बल्कि उनके साथ बैठकर दीवाली की खुशियां भी बांटीं। उस छोटे से दीये की रोशनी अब पूरे घर में फैल चुकी थी और दीनानाथ की उदासी हमेशा के लिए दूर हो गई थी।

छत पर टंगे लालटेन की रोशनी

सांझ ढलते ही गाँव के उस पुराने घर की छत पर एक लालटेन टंग जाती थी। यह परंपरा पिछले बीस सालों से चली आ रही थी। बूढ़े माधव जी हर शाम अपनी धुंधली आँखों से दूर सड़क की तरफ देखते, इस उम्मीद में कि उनका बेटा शहर से लौट आएगा। बरसों बीत गए, न बेटा आया और न ही लालटेन जलना बंद हुई। गाँव वाले कहते कि यह महज़ जिद है, पर माधव जी की निगाहों में इंतजार की एक ऐसी पवित्र लौ थी जो कभी धीमी नहीं पड़ती थी। एक सर्द शाम जब हवाएं तेज़ थीं, तभी एक कार आकर रुकी। दरवाजे से एक युवक उतरा और सीधे छत की सीढ़ियों की तरफ भागा। माधव जी ने जब उसे देखा, तो उनकी आँखों से बहते आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो डाले। उस रात वह लालटेन हमेशा के लिए बुझा दी गई, क्योंकि अब इंतजार की जरूरत नहीं थी।

माटी के दीये और उम्मीद की रात

दीपावली की रौनक हर तरफ थी, लेकिन कुम्हार मंगेश के घर में अंधेरा पसरा था। उसके बनाए हुए एक भी दीये इस बार नहीं बिके थे, क्योंकि लोग अब चाइनीज लड़ाइयों और मोमबत्तियों के दीवाने हो चुके थे। मंगेश मायूस होकर अपने चाक के पास बैठा सोच रहा था कि इस बार बच्चों को क्या जवाब देगा। तभी पड़ोस के छोटे से बच्चे ने आकर उसकी सारी उम्मीद जगा दी। उस बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो माटी के दीयों में ही होती है, मशीन के बने सामान में कहां जान होती है। बच्चे के उन मासूम शब्दों ने मंगेश के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी। उसने अपनी थकान भूला दी और फिर से दीयों को सजाने लगा। उस रात मंगेश के घर के दीये भले ही कम जले, लेकिन उसके दिल में जलती उम्मीद की लौ ने पूरे मोहल्ले को रोशन कर दिया था।

बरसात की रात और पुरानी डायरी

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और बिजली चले जाने से कमरे में सिर्फ मोमबत्ती की पीली रोशनी टिमटिमा रही थी। कबीर ने अपनी अलमारी से वह नीले जिल्द वाली पुरानी डायरी निकाली जो कई सालों से छुपी हुई थी। जैसे ही उसने पन्ने पलटे, कॉलेज के दिनों की वो भूली-बिसरी यादें ताजा हो गई जब उसने और उसके सबसे पक्के दोस्त ने साथ मिलकर बड़े-बड़े सपने देखे थे। जिंदगी के उतार-चढ़ाव में वे दोनों ऐसे बिछड़े कि आज दोनों के बीच सिर्फ खामोश दूरियाँ बची थीं। कबीर ने डायरी के आखिरी पन्ने पर दोस्त के लिए कुछ शब्द लिखे और खिड़की के बाहर गिरती बारिश को देखने लगा। उसे लगा कि रिश्ते मोमबत्ती की लौ की तरह होते हैं, जो हवा के झोंकों से बुझ तो सकते हैं लेकिन उनकी गर्माहट बहुत लंबे समय तक दिलों में बसी रहती है। उसने राहत की साँस ली और डायरी को फिर से संभाल कर रख दिया।

रात का पहरा और जलता हुआ दिया

अंधेरी रात चारों तरफ अपनी चादर फैला चुकी थी और गांव की सूनी सड़क पर केवल एक ही घर की खिड़की रोशन थी। अंदर एक बूढ़ी मां अपनी पलकें बिछाए दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठी थीं। शहर गए उनके बेटे को लौटेत-लौटते आधी रात से ज्यादा हो चुकी थी और आंधी-तूफान के कारण फोन का नेटवर्क भी पूरी तरह ठप था। मां के मन में अजीबोगरीब आशंकाएं घर कर रही थीं, फिर भी उन्होंने उम्मीद का दीया देहरी से बुझने नहीं दिया। अचानक दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई और बेटे को सीने से लगाते ही मां की आंखों से राहत के आंसू छलक पड़े।

मिट्टी के दीये और उम्मीद की लौ

दीपावली की रात थी और पूरा शहर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा था। लेकिन शहर के एक कोने में बूढ़े मंगेश चाचा अभी भी अपनी टूटी हुई झोपड़ी के बाहर अंधेरे में बैठे मिट्टी के दीये बेच रहे थे। महंगाई के इस दौर में अब चाइनीज लड़ियों के आगे किसी को मिट्टी के दीये कहां भाते हैं। मंगेश चाचा की आँखें सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को देख रही थीं कि शायद कोई तो उनके बनाए दीये खरीदेगा ताकि घर में चूल्हा जल सके। तभी वहां एक छोटा बच्चा अपने माता-पिता के साथ आया और उसने चाचा की टोकरी के सारे दीये खरीदने की जिद पकड़ ली। बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो इन्हीं दीयों से होती है। उस बच्चे की बात सुनकर मंगेश चाचा के बुझते हुए दिल में उम्मीद की एक नया दीया जल उठा और उनकी आँखें खुशी से छलक आईं।

आधी रात का आईना

नताशा ने अपने नए घर के बेडरूम में एक पुराना एंटीक आईना लगाया था, जिसकी फ्रेम पर बारीक नक्काशी की गई थी। वह अक्सर रात को सोने से पहले उस आईने में अपने बाल संवारती थी। एक रात, जब उसने घड़ी में बारह बजते देखे, तो उसने महसूस किया कि आईने में उसका अक्स उसकी नकल नहीं कर रहा है। उसका अक्स अपनी जगह पर स्थिर था, जबकि नताशा बिस्तर पर पीछे हट रही थी। अचानक आईने के भीतर से एक ठंडी हवा का झोंका आया और कांच पर धुंध जम गई। उस धुंध पर किसी ने अपनी उंगली से लिखा - अब मैं बाहर आ रही हूं। नताशा ने चीखने की कोशिश की लेकिन उसकी आवाज गले में ही घुट गई और चारों ओर घना अंधेरा छा गया।

रेलवे स्टेशन का आखिरी मुसाफिर

रात के दो बज चुके थे और मानसिंह अपनी आखिरी ट्रेन का इंतजार वीरान प्लेटफॉर्म पर कर रहा था। स्टेशन पर उसके अलावा कोई टिकट कलेक्टर भी नजर नहीं आ रहा था। तभी पटरियों पर लोहे की रगड़ खाने की भयानक आवाज गूंजी और एक पुरानी भाप इंजन वाली ट्रेन आकर रुक गई। डिब्बों की खिड़कियों से कोई रोशनी नहीं आ रही थी। जिज्ञासावश मानसिंह ने एक डिब्बे का दरवाजा खोला और अंदर कदम रखा। अचानक ट्रेन तेजी से चल पड़ी और अंदर बैठे सभी यात्री बिना चेहरे के काले साये निकले। उन्होंने मानसिंह को घेर लिया। सुबह जब पैसेंजर ट्रेन आई, तो मानसिंह उस पटरी से कई मील दूर बेहोश मिला, और उसके हाथ में उसी पुरानी ट्रेन का एक जंग लगा टिकट था।

जंगलों के बीच का पुराना कुआं

गांव के छोर पर स्थित एक सूखे कुएं के बारे में बुजुर्गों का कहना था कि वहां शाम के बाद मत जाना। शहर से आया आलोक इस अंधविश्वास को दूर करने की चुनौती मान बैठा। एक अमावस्या की रात वह उस कुएं के पास पहुंचा और टॉर्च की रोशनी अंदर डाली। कुएं की गहराई से एक मीठी और जानी-पहचानी आवाज ने उसे पुकारा, आओ मुझे बाहर निकालो। जैसे ही वह कुएं की मुंडेर के और करीब गया, उसे एहसास हुआ कि वह आवाज उसकी अपनी ही थी, जो किसी मरे हुए गले से निकल रही थी। वह डर के मारे पीछे हटा और गांव की ओर भागा। आज भी वह उस रात को याद करके कांप उठता है, क्योंकि उसने खुद अपनी लाश कुएं के भीतर तैरते हुए देखी थी।

नीली रोशनी का साया

रोहन ने जब अपने नए कमरे में प्रवेश किया, तो उसे दीवारों पर अजीब से नीले धब्बे दिखाई दिए। उसे लगा कि शायद यह सीलन का असर होगा, इसलिए उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। रात के ठीक बारह बजे, कमरे का तापमान अचानक बहुत कम हो गया और एक अजीब सी फुसफुसाहट सुनाई देने लगी। रोहन ने उठकर देखा तो कोने में रखी पुरानी अलमारी अपने आप खुल रही थी। अलमारी के भीतर से कोई अदृश्य ताकत बाहर आई और उसके ठीक सामने आकर खड़ी हो गई। उसने डरकर आंखें बंद कर लीं और जब सुबह हुई, तो वह कमरा पूरी तरह बदल चुका था।