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मिट्टी के खिलौने और बचपन की खुशबू

सावन का महीना था और चारों तरफ गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू फैली हुई थी। गाँव के एक छोटे से कोने में रामू भैया चाक पर बैठ कर बड़े चाव से मिट्टी के खिलौने बना रहे थे। उनके हाथ बिना किसी मशीन के जादू की तरह चलते थे और देखते ही देखते घोड़ी, हाथी और सुंदर गुड़िया तैयार हो जाती थी। बच्चे हमेशा उनकी दुकान के बाहर जमा रहते थे, आँखों में चमक लिए। रामू कभी किसी बच्चे को खाली हाथ नहीं लौटाते थे, भले ही उसके पास पैसे हों या न हों। एक दिन एक शहर से आया अमीर व्यक्ति उनकी दुकान पर रुका। उसने उन खिलौनों की सादगी देखकर हैरानी जताई और सारे खिलौने एकमुश्त खरीदने की इच्छा जताई। उसने रामू को मुंहमांगी कीमत देनी चाही ताकि वह उन्हें शहर के बड़े शोरूम में बेच सके। रामू कुछ पल के लिए शांत हो गए। उन्होंने अपने गंदे और थके हाथों को देखा, फिर उन बच्चों के चेहरों को जो दूर खड़े होकर डरे हुए थे कि अब वे कभी खिलौने नहीं देख पाएंगे। रामू ने शहर वाले व्यक्ति को मना कर दिया। उन्होंने कहा कि ये खिलौने सिर्फ मिट्टी के नहीं हैं, इन पर इन बच्चों की मासूम हंसी और मेरे बरसों का सुकून टिका है, जिसे खरीदा नहीं जा सकता। शहर वाला व्यक्ति हैरान लौट गया और रामू के चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान बिखर गई।

रेलवे स्टेशन की बेंच

व्यस्त रेलवे स्टेशन की एक ठंडी लोहे की बेंच पर पिछले दो घंटे से एक बूढ़ा व्यक्ति अपनी डायरी में कुछ लिख रहा था। चारों ओर यात्रियों की भारी भीड़ थी, ट्रेनें आ-जा रही थीं और लाउडस्पीकर की आवाज गूँज रही थी। उसी बेंच के दूसरे कोने पर एक छोटा बच्चा अपनी माँ का हाथ पकड़कर उदास बैठा था क्योंकि उसकी पसंदीदा गेंद पटरी पर गिरकर खो गई थी। बूढ़े व्यक्ति ने लिखना बंद किया, अपनी जेब से एक नई चमकीली गेंद निकाली और मुस्कुराते हुए बच्चे की ओर बढ़ा दी। बच्चे का चेहरा खुशी से खिल उठा और उसने झटपट उसे गले लगा लिया। उस एक छोटी सी मुस्कान और मासूमियत ने रेलवे स्टेशन के उस थकान भरे माहौल को पलभर में एक खूबसूरत और जीवंत पलों में बदल दिया।

लोहे का संदूक

गाँव के एक पुराने मकान के कोने में धूल फाँकता लोहे का एक भारी संदूक रखा था। रमेशन दादा ने कई दशकों से उसे नहीं खोला था। सब यही मानते थे कि उसमें केवल पुराने कागजात और बेकार का सामान भरा होगा। एक दिन जब घर की मरम्मत का काम शुरू हुआ, तो उस संदूक को हटाना जरूरी हो गया। रमेश ने जब संदूक की जंक लगी चाबी ताले में घुमाई, तो वह अजीब सी आवाज के साथ खुल गया। अंदर कोई खजाना नहीं था, बल्कि बचपन के कुछ धुंधले खिलौने, एक टूटी हुई बाँसुरी और उसकी दिवंगत माँ के हाथ की सिली हुई कुछ सुंदर पोटलियाँ थीं। उन चीजों को देखते ही रमेश के मन में बरसों पुरानी यादों का सैलाब उमड़ पड़ा। वह समझ गया कि असली दौलत सोने-चांदी में नहीं, बल्कि अपनों के छोड़े गए स्पर्श में होती है।

अस्पताल के बाहर बैठी रूहानी उम्मीद

अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच समय जैसे थम सा गया था। बाहर बेंच पर बैठी सुशीला देवी लगातार भगवान से अपने इकलौते बेटे की सलामती की दुआ मांग रही थी। अंदर डॉक्टर सर्जरी में जुटे थे और बाहर हर एक सेकंड भारी गुजर रहा था। तभी एक अजनबी शख्स उनके पास आया, जिसने कुछ साल पहले खुद अपना बेटा खो दिया था। उस अजनबी ने सुशीला का कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में थामा और बिना कुछ कहे सिर्फ ढांढस बंधाया। उस स्पर्श में एक अनोखा सुकून था, जैसे किसी ने घाव पर मरहम लगा दिया हो। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। सुशीला की आंखें खुशी से छलक उठीं और उसने उस अजनबी को धन्यवाद दिया, जो फरिश्ता बनकर उसकी जिंदगी में आया था।

अल्मारी में रखी पुरानी डायरी

सफाई करते वक्त आलोक के हाथ उसकी मां की बरसों पुरानी डायरी लग गई। धूल झाड़कर उसने जब पन्ने पलटे, तो मां के हाथों की सुंदर लिखावट ने उसे अतीत में धकेल दिया। हर पन्ने पर उसके बचपन की कोई न कोई खट्टी-मीठी याद दर्ज थी। एक पन्ने पर लिखा था कि कैसे उसने तेज बुखार में पूरी रात जागकर आलोक की सेवा की थी। यह सब पढ़ते हुए आलोक की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि कैसे व्यस्तता के चलते उसने अपनी मां को पिछले कुछ महीनों से फोन तक नहीं किया था। मां तो अब इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन डायरी के उन शब्दों ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसने डायरी को अपने सीने से लगाया और खुद से वादा किया कि वह रिश्तों को कभी पीछे नहीं छोड़ेगा।

अटेरे में रखी धूल भरी ट्रंक

जब रोहन ने अपने पुरखों के घर की सफाई शुरू की, तो अटारी के एक कोने में उसे लोहे की भारी ट्रंक मिली। उस पर समय की धूल और जंग की परतें जमी हुई थीं। बड़ी मुश्किल से जब उसने उसका ताला खोला, तो अंदर बचपन की कई अनमोल चीजें और उसकी माँ की साड़ियां रखी मिलीं। साड़ियों की तहों के बीच से एक लिफाफा गिरा जिस पर रोहन का नाम लिखा था। वह खत उसकी माँ ने उसके बोर्ड परीक्षा के दिनों में लिखा था, जिसमें उसकी सफलता के लिए दुआएं और अगाध प्रेम था। उस खत को पढ़ते ही रोहन की आँखों से आंसू बह निकले। वह समझ गया कि माँ भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका आशीर्वाद आज भी उसके साथ है। इस अनपेक्षित उपहार ने उसके भीतर एक अजीब सी शांति भर दी और उसने ट्रंक की हर चीज़ को सीने से लगा लिया।

गुलाब के पौधे की देखभाल करती वृद्धा

वृद्धा आश्रम के कोने में बनी छोटी सी क्यारी में कमला जी रोज सुबह पानी डाला करती थीं। उनके पास इस दुनिया में अपना कहने के लिए कोई नहीं था, सिवाय इन गुलाब के पौधों के जिन्हें उन्होंने अपने हाथों से सींचा था। लोग कहते थे कि वे किस बात का इंतजार कर रही हैं, जब उनके अपने ही उन्हें यहाँ छोड़ गए हैं। लेकिन कमला जी की आँखों में शिकायत नहीं, बल्कि एक अजीब सी उम्मीद थी कि शायद कभी कोई अपना उनसे मिलने आएगा। एक दिन जब एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर उस क्यारी के पास आया और उसने एक फूल को छुआ, तो कमला जी के चेहरे पर बरसों बाद वैसी ही मुस्कान लौटी जैसी कभी उनके अपने बच्चों के होने पर हुआ करती थी। उस एक पल ने उनके सूनेपन को इस तरह भर दिया कि उन्हें लगा जैसे पूरी दुनिया की खुशियाँ उन्हें मिल गई हों।

माँ के हाथों की बनी आखिरी चाय

किचन से आती अदरक और इलायची की खुशबू ने अचानक सुमित को उसके बचपन के दिनों में वापस खींच लिया। वह लैपटॉप पर काम कर रहा था, लेकिन ध्यान उस गर्म प्याले पर था जो हमेशा उसकी माँ उसके पास रख जाया करती थी। आज माँ इस दुनिया में नहीं हैं, और यह खुशबू सिर्फ उनकी यादों का एक धुंधला सा हिस्सा बनकर रह गई है। सुमित ने जब उस खाली मेज़ को देखा, तो आँखों से आँसू छलक आए। तभी हवा का एक तेज झोंका आया और खिड़की पर रखा माँ का पसंदीदा पौधा हल्का सा हिल गया, मानो वह कह रहा हो कि वह अभी भी यहीं आस-पास हैं। उस पल सुमित को अहसास हुआ कि अपनों का साथ भले ही छूट जाए, लेकिन उनका प्यार और उनकी दी हुई सीख हमेशा हमारे साथ रहती है। उसने गहरी साँस ली, प्याले को छुआ और अपने काम में फिर से जुट गया, इस बार दिल में एक अजीब सा सुकून लेकर।

घर वापसी का अनचाहा सफर

सालों बाद जब सोहन अपने पैतृक गांव की धूल भरी पगडंडी पर उतरा, तो उसके कदम खुद-ब-खुद उस टूटे हुए घर की तरफ बढ़ गए जिसे वह कभी छोड़कर भागा था। शहर की चमक-धमक में उसने सब कुछ पा लिया था, सिवाय उस सुकून के जो उसे अपनी माँ के आंचल में मिलता था। जब उसने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, तो दिल जोर से धड़क रहा था। अंदर से बूढ़े हाथों ने दरवाजा खोला और सामने उसकी माँ खड़ी थी। बिना किसी उलाहना या शिकायत के, माँ ने उसे अपनी बाहों में भींच लिया। उस एक आलिगन में शहर की सारी थकान और वर्षों का अकेलापन पल भर में काफूर हो गया। सोहन को समझ आ गया कि सफलता की ऊंची इमारतें उस मिट्टी के घर के आगे बिल्कुल फीकी हैं जहाँ माँ का प्यार बसता है।

रात का पहरा और जलता हुआ दिया

अंधेरी रात चारों तरफ अपनी चादर फैला चुकी थी और गांव की सूनी सड़क पर केवल एक ही घर की खिड़की रोशन थी। अंदर एक बूढ़ी मां अपनी पलकें बिछाए दरवाजे की ओर टकटकी लगाए बैठी थीं। शहर गए उनके बेटे को लौटेत-लौटते आधी रात से ज्यादा हो चुकी थी और आंधी-तूफान के कारण फोन का नेटवर्क भी पूरी तरह ठप था। मां के मन में अजीबोगरीब आशंकाएं घर कर रही थीं, फिर भी उन्होंने उम्मीद का दीया देहरी से बुझने नहीं दिया। अचानक दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई और बेटे को सीने से लगाते ही मां की आंखों से राहत के आंसू छलक पड़े।

सांझ की देहरी पर इंतजार

सुलोचना जी रोज शाम को अपनी बालकनी में बैठकर सड़क के मोड़ को निहारा करती थीं। उनका बेटा दस साल पहले शहर नौकरी करने गया था और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फोन की घंटियां अब महीनों में बजती थीं और उनमें भी औपचारिकता अधिक होती थी। बूढ़ी आंखों में हर आने वाले शख्स का अक्स उनके बेटे जैसा लगता था। पड़ोस के बच्चे उन्हें दादी कहकर पुकारते और उनके साथ वक्त बिताते, जिससे उनका सूनापन थोड़ा कम हो जाता था। एक दिन जब बारिश तेज हो रही थी, तो दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुलोचना जी ने दरवाजा खोला तो सामने उनका बेटा खड़ा था, जिसने सामान फेंककर मां को गले से लगा लिया। उस एक पल ने वर्षों की दूरी और कड़वाहट को आंसुओं में बहा दिया।

माँ के हाथ की आखिरी चाय

नौकरी के सिलसिले में महानगर आए रोहन को हमेशा से अपनी व्यस्त जीवनशैली पर गर्व था। माँ जब भी गांव से फोन करतीं, वह काम का बहाना बनाकर बात टाल देता था। एक दिन अचानक माँ का स्वास्थ्य बिगड़ने का समाचार मिला और वह तुरंत गांव के लिए रवाना हुआ। जब वह घर पहुंचा, तो माँ की सांसें थम चुकी थीं, लेकिन उनके पलंग के पास चायदानी और एक कप गरम चाय रखी थी, जिसे उन्होंने शायद बेटे के आने की आस में बनाया था। उस ठंडी हो चुकी चाय को देखकर रोहन का अहंकार पल भर में चकनाचूर हो गया। उसे समझ आया कि सफलता की दौड़ में वह अपनी सबसे बड़ी पूंजी खो चुका था।