सांझ की हल्की फुहार
शाम का वक्त था और आसमान में काले बादल घिर आए थे। मीरा अपनी बालकनी में खड़ी होकर ठंडी हवा का आनंद ले रही थी, तभी अचानक बारिश की तेज बूंदें गिरने लगीं। उसे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब वह ऐसे ही मौसम में कागज़ की नावें बनाकर पानी में तैराती थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। उसने दरवाजा खोला तो सामने उसका पुराना मित्र कबीर खड़ा था, जिसके हाथ में गरम चाय के दो कप थे। कई सालों बाद हुई इस अचानक मुलाकात ने दोनों के चेहरों पर एक अनूठी खुशी ला दी। बारिश की उस फुहार ने उनके बीच की दूरी को मिटा दिया और पुरानी यादों को फिर से तरोताजा कर दिया। उन्होंने बैठकर पुरानी बातें की और महसूस किया कि कुछ रिश्ते वक्त के साथ और भी ज्यादा गहरे हो जाते हैं।
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