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सांझ की हल्की फुहार

शाम का वक्त था और आसमान में काले बादल घिर आए थे। मीरा अपनी बालकनी में खड़ी होकर ठंडी हवा का आनंद ले रही थी, तभी अचानक बारिश की तेज बूंदें गिरने लगीं। उसे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब वह ऐसे ही मौसम में कागज़ की नावें बनाकर पानी में तैराती थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। उसने दरवाजा खोला तो सामने उसका पुराना मित्र कबीर खड़ा था, जिसके हाथ में गरम चाय के दो कप थे। कई सालों बाद हुई इस अचानक मुलाकात ने दोनों के चेहरों पर एक अनूठी खुशी ला दी। बारिश की उस फुहार ने उनके बीच की दूरी को मिटा दिया और पुरानी यादों को फिर से तरोताजा कर दिया। उन्होंने बैठकर पुरानी बातें की और महसूस किया कि कुछ रिश्ते वक्त के साथ और भी ज्यादा गहरे हो जाते हैं।

सांझ की देहरी पर इंतजार

सुलोचना जी रोज शाम को अपनी बालकनी में बैठकर सड़क के मोड़ को निहारा करती थीं। उनका बेटा दस साल पहले शहर नौकरी करने गया था और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। फोन की घंटियां अब महीनों में बजती थीं और उनमें भी औपचारिकता अधिक होती थी। बूढ़ी आंखों में हर आने वाले शख्स का अक्स उनके बेटे जैसा लगता था। पड़ोस के बच्चे उन्हें दादी कहकर पुकारते और उनके साथ वक्त बिताते, जिससे उनका सूनापन थोड़ा कम हो जाता था। एक दिन जब बारिश तेज हो रही थी, तो दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुलोचना जी ने दरवाजा खोला तो सामने उनका बेटा खड़ा था, जिसने सामान फेंककर मां को गले से लगा लिया। उस एक पल ने वर्षों की दूरी और कड़वाहट को आंसुओं में बहा दिया।

कागज़ की नाव और सावन

सावन की पहली झड़ी लगते ही मोहल्ले के बच्चे गलियों में पानी बहाने लगे। कबीर अपनी बालकनी में खड़ा होकर बस बारिश की बूंदों को देख रहा था, तभी नीचे से एक कागज़ की नाव तैरती हुई उसके घर के सामने आकर रुक गई। उस नाव पर एक छोटा सा संदेश लिखा था - क्या हम दोस्त बन सकते हैं? कबीर ने मुस्कुराते हुए उसी नाव पर जवाब लिखा और उसे पानी के तेज बहाव में आगे बढ़ा दिया। वह नाव किसी और की नहीं, बल्कि नीचे भीग रही मीरा की थी। उस बारिश ने दोनों को हमेशा के लिए एक ऐसा रिश्ता दे दिया, जो सावन की हर बूंद के साथ और अधिक गहरा होता चला गया।

अंधेरे कमरे में जलती मोमबत्ती

शहर की चकाचौंध से दूर, एक पुराने और शांत इलाके में रोहन अकेला रहता था। उसकी जिंदगी एक ऐसी मोमबत्ती की तरह थी जो बिना हवा के भी कांपती रहती थी। एक शाम जब अचानक पूरे मोहल्ले की बिजली चली गई, तो उसने अपनी खिड़की पर एक छोटी सी मोमबत्ती जलाई। तभी पड़ोसी बालकनी से किसी ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा। वह सिमरन थी, जो हाल ही में उस मकान में शिफ्ट हुई थी। उस दिन बिना किसी बात के दोनों के बीच लंबी आँख मिचौली वाली बातें शुरू हो गईं। अंधेरे ने उनके दिल के दरवाजों पर दस्तक दे दी थी और मोमबत्ती की रोशनी ने उनके बीच की दूरियों को हमेशा के लिए मिटा दिया।

कांच की खिड़की और बारिश की बूंदें

जब भी झमाझम बारिश होती, नयना अपनी खिड़की के पास बैठकर बाहर देखने लगती। सामने वाले घर की बालकनी में अक्सर कबीर अपनी गिटार के तारों को छेड़ता नजर आता था। दोनों के बीच कभी कोई सीधी बात नहीं हुई थी, बस खिड़कियों से होता हुआ एक खामोश संवाद था। एक दिन बारिश इतनी तेज थी कि बिजली चली गई और दोनों अपनी-अपनी बालकनी में आ गए। मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में कबीर ने गिटार पर वह धुन बजाई जो अक्सर वह नयना को देखते हुए गुनगुनाता था। नयना ने मुस्कुराते हुए अपनी खिड़की से ही एक फूल उसकी तरफ उछाल दिया। उस बारिश की रात ने दोनों के बीच की दूरी को हमेशा के लिए मिटा दिया और एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई।

शाम की चौखट

सूरज ढल रहा था और पुरानी हवेली के सामने वाली चाय की दुकान पर लोगों की भीड़ कम हो रही थी। कबीर हर शाम अपनी साइकिल वहीं रोकता था क्योंकि उसे पता था कि उस वक्त शिखा अपनी बालकनी से पौधे को पानी देने जरूर आएगी। दोनों के बीच सिर्फ नजरों का संवाद होता था, जो शब्दों से कहीं ज्यादा बयां कर देता था। एक दिन हवा इतनी तेज चली कि शिखा के हाथ से गमला छूटकर नीचे गिरने ही वाला था कि कबीर ने फुर्ती से आगे बढ़कर उसे थाम लिया। उस मामूली सी घटना ने दोनों के बीच के सारे संकोच को तोड़ दिया और पहली बार उनके बीच सीधी बातचीत हुई। ढलते सूरज की रोशनी में दोनों ने महसूस किया कि उनका यह मौन प्यार अब एक मुखर हकीकत बन चुका था।