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अस्पताल के बाहर बैठी रूहानी उम्मीद

अस्पताल की सफेद दीवारों के बीच समय जैसे थम सा गया था। बाहर बेंच पर बैठी सुशीला देवी लगातार भगवान से अपने इकलौते बेटे की सलामती की दुआ मांग रही थी। अंदर डॉक्टर सर्जरी में जुटे थे और बाहर हर एक सेकंड भारी गुजर रहा था। तभी एक अजनबी शख्स उनके पास आया, जिसने कुछ साल पहले खुद अपना बेटा खो दिया था। उस अजनबी ने सुशीला का कांपता हुआ हाथ अपने हाथों में थामा और बिना कुछ कहे सिर्फ ढांढस बंधाया। उस स्पर्श में एक अनोखा सुकून था, जैसे किसी ने घाव पर मरहम लगा दिया हो। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आए और उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। सुशीला की आंखें खुशी से छलक उठीं और उसने उस अजनबी को धन्यवाद दिया, जो फरिश्ता बनकर उसकी जिंदगी में आया था।

अल्मारी में रखी पुरानी डायरी

सफाई करते वक्त आलोक के हाथ उसकी मां की बरसों पुरानी डायरी लग गई। धूल झाड़कर उसने जब पन्ने पलटे, तो मां के हाथों की सुंदर लिखावट ने उसे अतीत में धकेल दिया। हर पन्ने पर उसके बचपन की कोई न कोई खट्टी-मीठी याद दर्ज थी। एक पन्ने पर लिखा था कि कैसे उसने तेज बुखार में पूरी रात जागकर आलोक की सेवा की थी। यह सब पढ़ते हुए आलोक की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि कैसे व्यस्तता के चलते उसने अपनी मां को पिछले कुछ महीनों से फोन तक नहीं किया था। मां तो अब इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन डायरी के उन शब्दों ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसने डायरी को अपने सीने से लगाया और खुद से वादा किया कि वह रिश्तों को कभी पीछे नहीं छोड़ेगा।

माटी के दीये और उम्मीद की रात

दीपावली की रौनक हर तरफ थी, लेकिन कुम्हार मंगेश के घर में अंधेरा पसरा था। उसके बनाए हुए एक भी दीये इस बार नहीं बिके थे, क्योंकि लोग अब चाइनीज लड़ाइयों और मोमबत्तियों के दीवाने हो चुके थे। मंगेश मायूस होकर अपने चाक के पास बैठा सोच रहा था कि इस बार बच्चों को क्या जवाब देगा। तभी पड़ोस के छोटे से बच्चे ने आकर उसकी सारी उम्मीद जगा दी। उस बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो माटी के दीयों में ही होती है, मशीन के बने सामान में कहां जान होती है। बच्चे के उन मासूम शब्दों ने मंगेश के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी। उसने अपनी थकान भूला दी और फिर से दीयों को सजाने लगा। उस रात मंगेश के घर के दीये भले ही कम जले, लेकिन उसके दिल में जलती उम्मीद की लौ ने पूरे मोहल्ले को रोशन कर दिया था।

गाँव की धूल भरी सड़क पर कदम

शहर की चकाचौंध से थक कर सोहन पंद्रह साल बाद अपने पैतृक गाँव लौटा था। कंक्रीट के जंगलों में भागते-भागते वह अपनी जड़ों को भूल चुका था। जैसे ही उसने गाँव की सीमा में कदम रखा, वही पुरानी सोंधी मिट्टी की महक और दूर खेतों से आती बांसुरी की धुन ने उसका स्वागत किया। उसे डर था कि शायद अब उसे कोई पहचानेगा भी नहीं। लेकिन तभी पेड़ की छांव में बैठे ताऊजी ने उसे दूर से ही पहचान लिया और दौड़कर गले लगा लिया। गाँव के लोगों का वह अपनापन देखकर सोहन की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उसे एहसास हुआ कि दुनिया चाहे कितनी भी तरक्की कर ले, असली सुकून अपने लोगों के बीच और अपनी मातृभूमि की गोद में ही मिलता है। उस शाम उसने चैन की सांस ली और शहर वापस जाने का विचार हमेशा के लिए त्याग दिया।

अटेरे में रखी धूल भरी ट्रंक

जब रोहन ने अपने पुरखों के घर की सफाई शुरू की, तो अटारी के एक कोने में उसे लोहे की भारी ट्रंक मिली। उस पर समय की धूल और जंग की परतें जमी हुई थीं। बड़ी मुश्किल से जब उसने उसका ताला खोला, तो अंदर बचपन की कई अनमोल चीजें और उसकी माँ की साड़ियां रखी मिलीं। साड़ियों की तहों के बीच से एक लिफाफा गिरा जिस पर रोहन का नाम लिखा था। वह खत उसकी माँ ने उसके बोर्ड परीक्षा के दिनों में लिखा था, जिसमें उसकी सफलता के लिए दुआएं और अगाध प्रेम था। उस खत को पढ़ते ही रोहन की आँखों से आंसू बह निकले। वह समझ गया कि माँ भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका आशीर्वाद आज भी उसके साथ है। इस अनपेक्षित उपहार ने उसके भीतर एक अजीब सी शांति भर दी और उसने ट्रंक की हर चीज़ को सीने से लगा लिया।

पिता की पुरानी साइकिल की घंटी

सुबह के ठीक छह बजे जब भी गली में साइकिल की घंटी बजती थी, सोहन समझ जाता था कि उसके पिता काम से लौट आए हैं। वह घंटी सिर्फ एक साइकिल का हिस्सा नहीं थी, बल्कि उसके सुरक्षित बचपन का एक प्रतीक थी। समय बीता, पिता का साया उठ गया और वह पुरानी साइकिल जंग खाकर कबाड़ बन गई। सोहन ने उस साइकिल को कबाड़ में बेचने का फैसला किया और मैकेनिक को बुला लिया। जैसे ही मैकेनिक उसे ले जाने लगा, सोहन का बेटा दौड़कर आया और उसने उस टूटी हुई घंटी को निकाल कर अपने हाथ में रख लिया। उसने जैसे ही घंटी बजाई, उसकी आवाज़ ने सोहन के भीतर दबे बचपन के सारे अहसासों को फिर से जीवंत कर दिया। सोहन की आंखें भर आईं और उसने मैकेनिक को पैसे देकर साइकिल वापस रखवा ली। उस घंटी की खनक ने उसे याद दिलाया कि पिता कहीं नहीं गए, वे आज भी उसकी हर सुबह में मौजूद हैं।

रेलवे स्टेशन का वह अंतिम पत्र

प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी गूंज रही थी और आलोक के हाथ में एक मुड़ा हुआ लिफाफा था। यह लिफाफा उसकी छोटी बहन ने उसे तब दिया था जब वह सालों पहले घर छोड़कर शहर आया था। उस समय गुस्से में उसने इसे पढ़ा तक नहीं था और अपनी बैग की सबसे निचली तह में दबा दिया था। आज जब वह अपने पैतृक घर लौट रहा था, पुरानी अलमारी समेटते वक्त उसे यह पत्र मिला। जैसे ही उसने लिफाफा फाड़ा, अंदर से कुछ सूखे हुए चमेली के फूल और बहन के सुंदर अक्षरों में लिखा संदेश निकला। बहन ने लिखा था कि चाहे रास्ते कितने भी अलग क्यों न हो जाएं, भाई का दरवाजा हमेशा उसके लिए खुला रहेगा। उस एक पन्ने ने आलोक की आंखें खोल दी और उसका सारा अहंकार एक पल में पिघल गया। वह ट्रेन से उतरते ही सीधा अपनी बहन के घर की तरफ दौड़ पड़ा, जहां सदियों का सूनापन प्यार की एक झप्पी में बदल गया।

गुलाब के पौधे की देखभाल करती वृद्धा

वृद्धा आश्रम के कोने में बनी छोटी सी क्यारी में कमला जी रोज सुबह पानी डाला करती थीं। उनके पास इस दुनिया में अपना कहने के लिए कोई नहीं था, सिवाय इन गुलाब के पौधों के जिन्हें उन्होंने अपने हाथों से सींचा था। लोग कहते थे कि वे किस बात का इंतजार कर रही हैं, जब उनके अपने ही उन्हें यहाँ छोड़ गए हैं। लेकिन कमला जी की आँखों में शिकायत नहीं, बल्कि एक अजीब सी उम्मीद थी कि शायद कभी कोई अपना उनसे मिलने आएगा। एक दिन जब एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर उस क्यारी के पास आया और उसने एक फूल को छुआ, तो कमला जी के चेहरे पर बरसों बाद वैसी ही मुस्कान लौटी जैसी कभी उनके अपने बच्चों के होने पर हुआ करती थी। उस एक पल ने उनके सूनेपन को इस तरह भर दिया कि उन्हें लगा जैसे पूरी दुनिया की खुशियाँ उन्हें मिल गई हों।

पिता का पुराना चमड़े का ब्रीफकेस

अलमारी के सबसे निचले हिस्से में धूल फांक रहा वह पुराना चमड़े का ब्रीफकेस आज बाहर निकला था। रोहन ने जब उसकी चेन खोली, तो अंदर से कुछ पुराने कागजात और एक टूटी हुई कलम निकली। यह वही ब्रीफकेस था जिसे उसके पिता रोज सुबह दफ्तर लेकर जाते थे और जिसके लौटने की आवाज सुनकर रोहन दौड़कर गेट पर पहुँच जाता था। उन दिनों रोहन को लगता था कि इस ब्रीफकेस में दुनिया भर की खुशियाँ और जरूरत का सामान बंद है। लेकिन वक्त बीतने के साथ रोहन खुद उसी दौड़ का हिस्सा बन गया, और पिता की मेहनत की कीमत उसे अब समझ आई जब वह खुद अपने बच्चों की जिम्मेदारियों में उलझ चुका था। उसने उस ब्रीफकेस को अपने सीने से लगा लिया और उसकी आँखों के सामने पिता का थका हुआ लेकिन मुस्कुराता चेहरा तैर गया। यह ब्रीफकेस सिर्फ चमड़े का थैला नहीं, बल्कि एक पिता के अंतहीन संघर्ष और त्याग की मूक दास्तान था।

माँ के हाथों की बनी आखिरी चाय

किचन से आती अदरक और इलायची की खुशबू ने अचानक सुमित को उसके बचपन के दिनों में वापस खींच लिया। वह लैपटॉप पर काम कर रहा था, लेकिन ध्यान उस गर्म प्याले पर था जो हमेशा उसकी माँ उसके पास रख जाया करती थी। आज माँ इस दुनिया में नहीं हैं, और यह खुशबू सिर्फ उनकी यादों का एक धुंधला सा हिस्सा बनकर रह गई है। सुमित ने जब उस खाली मेज़ को देखा, तो आँखों से आँसू छलक आए। तभी हवा का एक तेज झोंका आया और खिड़की पर रखा माँ का पसंदीदा पौधा हल्का सा हिल गया, मानो वह कह रहा हो कि वह अभी भी यहीं आस-पास हैं। उस पल सुमित को अहसास हुआ कि अपनों का साथ भले ही छूट जाए, लेकिन उनका प्यार और उनकी दी हुई सीख हमेशा हमारे साथ रहती है। उसने गहरी साँस ली, प्याले को छुआ और अपने काम में फिर से जुट गया, इस बार दिल में एक अजीब सा सुकून लेकर।

समुद्र किनारे रेत पर लिखा हुआ नाम

अनंत ने अपनी जिंदगी के कई साल सिर्फ पैसे कमाने की अंधी दौड़ में बिता दिए थे। इस दौड़ में वह अपने पुराने दोस्तों और परिवार से दूर हो गया था। जब वह तनाव से घिर गया, तो वह शहर छोड़कर समुद्र के शांत किनारे पर चला गया। वहाँ उसने गीली रेत पर अपने बचपन के सबसे अच्छे दोस्त का नाम लिखा, जिससे उसकी अनबन हो गई थी। लहरें आईं और उस नाम को अपने साथ बहा ले गईं। उस पल उसे समझ आया कि जिद और अहंकार से कुछ नहीं मिलता, रिश्ते रेत की तरह होते हैं जिन्हें बहुत संभाल कर रखना पड़ता है। उसने तुरंत अपने फोन से अपने दोस्त को फोन मिलाया।

अक्सर छूट जाते हैं कुछ अपने

रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की सीटी बजते ही आरव की निगाहें भीड़ में उस चेहरे को तलाशने लगीं जिसके बिना उसने कभी सफर नहीं किया था। पिछले दस सालों से हर सुख-दुःख में साए की तरह साथ निभाने वाला उसका दोस्त कबीर आज नौकरी के सिलसिले में दूसरे देश जा रहा था। दोनों के बीच हमेशा अनगिनत बातें होती थीं, लेकिन आज विदाई के वक्त दोनों के हलक सूख चुके थे। ट्रेन चलने लगी और कबीर ने खिड़की से हाथ बाहर बढ़ाया। आरव ने दौड़कर उसका हाथ थाम लिया, और उसी पल दोनों की आंखों से बह निकले आंसुओं ने सारे गिले-शिकवे धो दिए। फासले चाहे जितने भी बढ़ जाएं, कुछ रिश्ते समय और दूरी की सीमाओं से बहुत परे होते हैं।