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घड़ी की सुई और उम्मीद

अजय की घड़ी की टिक-टिक उसकी धड़कनों के साथ चल रही थी। इंटरव्यू का वक्त नजदीक आ रहा था और ट्रैफिक जाम ने उसकी सारी योजना पर पानी फेर दिया था। वह ऑटो से उतरकर बारिश के बीच पैदल ही दौड़ पड़ा क्योंकि यह नौकरी उसके परिवार के भविष्य के लिए बेहद जरूरी थी। कीचड़ में उसके जूते सन चुके थे और सांस फूल रही थी लेकिन हार मानने का सवाल ही नहीं था। जब वह ऑफिस के गेट पर पहुंचा, तो घड़ी ने ठीक इंटरव्यू का आखिरी मिनट दिखाया। रिसेप्शनिस्ट ने उसे अंदर जाने से मना कर दिया क्योंकि कड़ा नियम था। तभी कंपनी के मालिक ने उसे आते देख लिया और उसके संघर्ष भरे चेहरे को पढ़कर अंदर बुला लिया। मेहनत और समय की पाबंदी ने आखिरकार उसकी किस्मत का दरवाजा खोल ही दिया।

शीशे की अलमारी में रखी किताब

लाइब्रेरी के एक कोने में शीशे की अलमारी के भीतर कैद वह लाल जिल्द वाली किताब धूल फांक रही थी। कोई भी पाठक पिछले कई दशकों से उसकी तरफ देखता तक नहीं था क्योंकि उसका कवर पूरी तरह फीका पड़ चुका था। मीना, जो किताबों की शौकीन थी, की नज़र एक दिन उस पर पड़ी। उसने लाइब्रेरियन से विशेष अनुमति लेकर उसे बाहर निकलवाया और पन्ने पलटने लगी। अंदर पहले ही पन्ने पर एक खूबसूरत हाथ से लिखा संदेश था जो किसी ने साठ साल पहले अपने किसी खास के लिए लिखा था। उस संदेश के साथ एक सूखा हुआ गुलाब का फूल भी दबा हुआ था जो अब कागज़ का हिस्सा बन चुका था। उस किताब ने मीना को अहसास कराया कि शब्द और भावनाएं कभी नहीं मरते, वे बस सही वक्त का इंतजार करते हैं।

चाय की एक आखिरी चुस्की

हर शाम ढलते ही रमेश बाबू और उनका पुराना दोस्त मंगेश इस नुक्कड़ की दुकान पर एक कुल्हड़ चाय पीने के लिए जरूर मिलते थे। दोनों के बीच राजनीति से लेकर जीवन के हर छोटे-बड़े पहलू पर लंबी और दिलचस्प बहस हुआ करती थी जो कभी खत्म नहीं होती थी। एक दिन मंगेश शहर छोड़कर हमेशा के लिए दूर जा रहा था, और यह दोनों की साथ में आखिरी शाम थी। चाय की प्याली हाथ में थामे दोनों खामोश बैठे थे, क्योंकि शब्दों की जगह आज आंखों से आंसू अपनी बात कह रहे थे। जब रमेश बाबू ने चाय की आखिरी चुस्की ली, तो उन्हें समझ आया कि रिश्ते चाय के स्वाद से नहीं बल्कि साथ बिताए गए वक्त से गहरे होते हैं।

कागज का हवाई जहाज

बचपन के दिनों में रोहन और सोहन पन्ने फाड़कर खूबसूरत कागज के हवाई जहाज बनाते थे और उन्हें छत से आसमान की तरफ उड़ाते थे। दोनों ने मिलकर यह सपना देखा था कि वे बड़े होकर एक दिन सचमुच के विमान के पायलट बनेंगे। वक्त का पहिया घूमा और रोहन एक व्यस्त कॉर्पोरेट दफ्तर में कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने उलझ कर रह गया, जबकि सोहन का सपना अधूरा ही छूट गया। एक दिन सफाई करते समय रोहन के हाथ धूल से सना हुआ वही पुराना कागज का जहाज लगा, जिसे उन्होंने बचपन में साथ मिलकर बनाया था। उस कागज के टुकड़े को देखते ही रोहन को अपनी असली मंजिल और बचपन का वो बेफिक्र उत्साह याद आ गया। उसने तुरंत अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और अपने सपनों को नई उड़ान देने के लिए विमानन क्षेत्र की ओर कदम बढ़ा दिए।

सांझ की हल्की फुहार

शाम का वक्त था और आसमान में काले बादल घिर आए थे। मीरा अपनी बालकनी में खड़ी होकर ठंडी हवा का आनंद ले रही थी, तभी अचानक बारिश की तेज बूंदें गिरने लगीं। उसे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब वह ऐसे ही मौसम में कागज़ की नावें बनाकर पानी में तैराती थी। तभी दरवाजे की घंटी बजी। उसने दरवाजा खोला तो सामने उसका पुराना मित्र कबीर खड़ा था, जिसके हाथ में गरम चाय के दो कप थे। कई सालों बाद हुई इस अचानक मुलाकात ने दोनों के चेहरों पर एक अनूठी खुशी ला दी। बारिश की उस फुहार ने उनके बीच की दूरी को मिटा दिया और पुरानी यादों को फिर से तरोताजा कर दिया। उन्होंने बैठकर पुरानी बातें की और महसूस किया कि कुछ रिश्ते वक्त के साथ और भी ज्यादा गहरे हो जाते हैं।

पुरानी घड़ी का टिक-टिक

दादी जी की अलमारी में रखी दीवार घड़ी बरसों से बंद पड़ी थी, जिसकी सुइयां किसी खास वक्त पर जाकर थम गई थीं। रोहन जब भी उस कमरे में जाता, उसे वह घड़ी पुरानी और बेकार सी लगती थी। एक दिन उसने उस घड़ी को साफ करने और ठीक करने की सोची। जैसे ही उसने चाबी भरी, अचानक से उसके भीतर का तंत्र जाग उठा और उसकी टिक-टिक गूंजने लगी। उस आवाज के साथ ही घर के पुराने और सुनहरे दिन रोहन की आंखों के सामने तैरने लगे। उसे अहसास हुआ कि बीता हुआ वक्त भले ही वापस न आए, लेकिन उसकी यादें हमेशा हमारे दिलों में धड़कती रहती हैं।

गुमशुदा चाबी

रमेश बाबू पिछले दस साल से अपनी पुरानी अलमारी की चाबी तलाश रहे थे। हर कोने को छान मारा, लेकिन चाबी का कहीं अता-पता नहीं था। उस अलमारी में उनके बचपन की यादें और कुछ खास दस्तावेज बंद थे। आज जब वे घर की सफाई कर रहे थे, तो अचानक रसोई के एक पुराने डिब्बे से वह जंक लगी चाबी हाथ लग गई। उनके चेहरे पर खुशी की एक चमक आ गई। उन्होंने तुरंत अलमारी की तरफ कदम बढ़ाया और ताले में चाबी घुमाई। ताला खुल गया और बरसों पुरानी धूल उड़ने लगी। लेकिन जब उन्होंने भीतर झांका, तो उनका दिल बैठ गया। समय के दीमक ने सब कुछ कागजों को कुतर डाला था। जो खजाना वे सहेज कर रखना चाहते थे, वह अब सिर्फ राख और टुकड़ों में बदल चुका था। रमेश बाबू समझ गए कि कुछ चीजें खो जाने के बाद दोबारा मिलने पर भी उनका कोई अर्थ नहीं बचता।

बरसात की शाम

झमाझम बारिश हो रही थी और ऑफिस से घर लौटते वक्त विक्रम की गाड़ी अचानक बीच रास्ते में खराब हो गई। वह छाता भूल आया था और पूरी तरह भीग चुका था। पास ही एक छोटी सी चाय की टपरी खुली थी जहाँ उसने शरण ली। वहाँ एक बूढ़ा आदमी सुरीली आवाज में पुराना गजल गुनगुना रहा था और आने जाने वाले हर मुसाफिर को अदरक वाली गरमागरम चाय पिला रहा था। विक्रम ने जब चाय की चुस्की ली, तो उसकी सारी थकान और दिनभर का तनाव पल भर में गायब हो गया। बारिश की वो शाम उसके लिए किसी वरदान से कम नहीं थी।

पीतल का पुराना कड़ा

सुमन को अपनी अलमारी साफ करते समय वह पीतल का पुराना कड़ा मिला जो उसके दादाजी ने उसे बचपन में दिया था। वक्त के साथ चमक फीकी पड़ गई थी और उस पर खरोंचें आ गई थीं। सुमन ने सोचा कि इसे कबाड़ में फेंक देना चाहिए। तभी उसकी बेटी आई और बोली कि यह कड़ा कितना अनोखा है। उसने उसे साफ किया और पॉलिश लगवाई। कुछ ही घंटों में वह कड़ा फिर से चमक उठा। सुमन को अहसास हुआ कि रिश्ते और पुरानी यादें भी बिल्कुल ऐसी ही होती हैं। उन्हें बस थोड़ी सी देखभाल और प्यार की जरूरत होती है ताकि उनकी चमक कभी कम न हो।

रेत पर बने पदचिह्न

सुबह के समय समुद्र तट पर टहलना सोहन का पुराना शौक था। वह रोज लहरों के साथ बहकर आने वाली सीपियों को देखता और अपने ख्यालों में खो जाता। एक दिन उसे रेत पर एक बहुत ही सुंदर और अनोखे आकार का पत्थर मिला। पत्थर पर प्राकृतिक रूप से एक फूल की आकृति उभरी हुई थी। सोहन ने सोचा कि यह किसी मूर्तिकार का अधूरा काम होगा जो लहरों में बहकर यहाँ आ गया। उसने उस पत्थर को अपनी जेब में रख लिया और घर लौट आया। घर आकर उसने जब उसे साफ किया, तो पाया कि उसके पीछे कुछ शब्द खुदे हुए थे। वे शब्द थे - जो तुम्हारा है, वह कभी न कभी तुम्हें ढूंढ ही लेगा। उस एक वाक्य ने सोहन के जीवन का नजरिया ही बदल दिया। उसे समझ आ गया कि सफलता और खुशी के लिए ज्यादा भागने की जरूरत नहीं होती, बस सही वक्त का इंतजार करना पड़ता है। आज सोहन हर सुबह उसी तट पर जाता है, लेकिन अब वह किसी चीज की तलाश नहीं करता, बल्कि जीवन के हर पल का आनंद लेता है।

दीवार पर टंगी पेंटिंग और खामोश रिश्ते

बैठक कक्ष की दीवार पर सजी वह अधूरी पेंटिंग बरसों से किसी के आने का इंतजार कर रही थी। पिता और पुत्र के बीच अनबन ऐसी थी कि दोनों एक छत के नीचे रहकर भी अजनबियों की तरह जीते थे। बेटा कला में नाम कमाना चाहता था, जबकि पिता को लगता था कि यह सब वक्त की बर्बादी है। एक दिन अचानक पिता की तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। जब बेटा उनके कमरे की सफाई कर रहा था, तब उसने मेज की दराज में अपनी बनाई हुई वे सारी तस्वीरें पाईं जिन्हें उसने बचपन में कभी फेंका था। हर तस्वीर के पीछे पिता ने गर्व से कुछ शब्द लिख रखे थे। उस पल बेटे को अहसास हुआ कि खामोशी के पीछे कितनी गहरी ममता छिपी थी। उसने अस्पताल जाकर पिता का हाथ थामा और दोनों की आंखें नम थीं, बिना कुछ कहे सब कुछ समझ चुकी थीं।

अल्मारी में रखी पुरानी डायरी

सफाई करते वक्त आलोक के हाथ उसकी मां की बरसों पुरानी डायरी लग गई। धूल झाड़कर उसने जब पन्ने पलटे, तो मां के हाथों की सुंदर लिखावट ने उसे अतीत में धकेल दिया। हर पन्ने पर उसके बचपन की कोई न कोई खट्टी-मीठी याद दर्ज थी। एक पन्ने पर लिखा था कि कैसे उसने तेज बुखार में पूरी रात जागकर आलोक की सेवा की थी। यह सब पढ़ते हुए आलोक की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि कैसे व्यस्तता के चलते उसने अपनी मां को पिछले कुछ महीनों से फोन तक नहीं किया था। मां तो अब इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन डायरी के उन शब्दों ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसने डायरी को अपने सीने से लगाया और खुद से वादा किया कि वह रिश्तों को कभी पीछे नहीं छोड़ेगा।