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Shayari

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अंजान रास्ते

कदमों ने जिन राहों पर चलना छोड़ दिया, आज उन पर ही तन्हा भटकना पड़ रहा है। मंज़िल का तो पता नहीं ऐ दोस्त, बस सफर का हर मोड़ डरा रहा है।

कांच के टुकड़े

बिखरे हुए कांच को समेटने चले थे हम, हर एक टुकड़े पर तेरा ही नाम लिखा मिला। जख्मों की गिनती भूल गए इस सफर में, बस दर्द का हर एक लम्हा हमें अपना सा लगा।

सूनी राहें

कदमों के निशान भी मिट गए इन रास्तों पर, जिन पर कभी हम दोनों साथ चला करते थे। आज तन्हाई ही मेरी हमसफ़र बन गई है।