अश्कों की दास्तां

अश्कों की दास्तां

“
रात भर जागकर हमने अपने ही ख्वाब जलाए हैं, तुम्हारी बेवफाई के चर्चे अब हर गली सुनाए हैं। संभल जाना तुम भी इस फरेबी दुनिया में, हमने तो बस अपनों से ही जख्म खाए हैं।
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खामोश तन्हाई

पत्थर दिल सनम से अब क्या गिला करें, कांटे ही मिले जब नसीब में फूल क्या खिला करें। खुद ही बुझा ली हमने उम्मीदों की वो शम्मा, अंधेरे में अब अकेले ही जिया करें।

झूठे अफसाने

तेरी हर बात में कोई नया फरेब होता था, हमारे सादगी भरे दिल को यही नसीब होता था। अब तेरी यादों से भी हमने किनारा कर लिया, बेवफाई का तेरा हर किस्सा दुबारा कर दिया।

बदले हुए रास्ते

मोहब्बत के सफर में हमको तन्हा छोड़ गए, वो जो हर मोड़ पर साथ निभाने की कसम तोड़ गए। अब किसी और की महफिल की वो शान बन बैठे, हमारे दिल के सारे अरमान तोड़ गए।

फरेब की रात

तेरी वफ़ा के किस्से अब हम किसे सुनाएं, जो खुद बदल गए उन्हें कैसे हम मनाएं। रातों ने हमारे अश्क चुपके से पी लिए, अब झूठे वादों के सहारे हम नहीं जिएं।