रेलवे स्टेशन का आखिरी फेरा
शाम ढल रही थी और प्लेटफार्म नंबर दो पर लोगों की भीड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। राघव पिछले दस सालों से इसी स्टेशन पर एक छोटी सी चाय की दुकान चला रहा था। हर शाम ठीक साढ़े सात बजे एक लड़की आती थी, एक कप ब्लैक टी लेती थी और खिड़की से बाहर दूर तक देखती थी। राघव कभी उससे ज्यादा बात नहीं कर पाया, बस उसकी पसंद की चाय बना देता था। आज जब वह लड़की आई, तो उसके हाथ में एक लिफाफा था। उसने चाय की चुस्की ली और लिफाफा राघव की तरफ बढ़ा दिया। राघव ने हैरानी से देखा तो उस पर लिखा था, 'शुक्रिया, मेरी तन्हाई बांटने के लिए।' ट्रेन की सीटी बजी और वह चल दी। राघव ने लिफाफा खोला तो उसके भीतर एक पुरानी तस्वीर और एक छोटा सा नोट था, जिसमें लिखा था कि अब वह शहर छोड़कर हमेशा के लिए जा रही है। राघव की आँखें भर आईं।
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