अंधेरे में जलता दीपक
घने जंगल के बीच एक छोटी सी कुटिया में एक संत रहते थे। उनके पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे। एक शाम एक अहंकारी विद्वान उनके पास आया और व्यंग्य से पूछा कि आपके इस छोटे से दीपक से इस विशाल जंगल का अंधेरा कैसे दूर हो सकता है। संत ने बिना किसी क्रोध के बड़े शांत भाव से उत्तर दिया कि यह दीपक पूरे जंगल का अंधेरा भले ही न मिटा पाए, लेकिन यह मेरे आसपास के रास्ते को तो रोशन कर ही रहा है, जिससे मैं ठोकर खाने से बच जाता हूं। विद्वान संत का यह उत्तर सुनकर स्तब्ध रह गया। उसे समझ आ गया कि बड़े बदलाव की शुरुआत हमेशा छोटे-छोटे कदमों से ही होती है। हमें दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपने हिस्से का प्रकाश खुद फैलाना चाहिए, तभी समाज में वास्तविक बदलाव संभव हो पाता है।
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