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सुनार की सच्ची परख

नगर के प्रसिद्ध सुनार मदन लाल के पास एक दिन एक युवक आया और उसने एक सोने का सिक्का दिखाकर उसे असली परखने को कहा। मदन लाल ने सिक्के को हाथ में लिया, उसकी चमक देखी, और फिर बिना कुछ बोले उसे तराजू पर तौल दिया। उन्होंने युवक से कहा कि सोना सिर्फ चमकने से असली नहीं होता, उसकी शुद्धता आग में तपकर ही साबित होती है। युवक ने हैरान होकर पूछा कि क्या इस सिक्के के साथ भी कुछ ऐसा करना होगा। मदन लाल ने समझाया कि इंसान का चरित्र भी सोने की तरह होता है, जो संकट और कठिनाइयों की भट्टी में तपकर ही अपनी असली कीमत और महानता साबित करता है। युवक को यह बात दिल पर लग गई और वह समझ गया कि जीवन की बाधाएं इंसान को मजबूत बनाती हैं।

चित्रकार और दर्पण

नगर के प्रसिद्ध चित्रकार विक्रम अपनी कला के लिए पूरे राज्य में जाने जाते थे। वह जब भी किसी का चित्र बनाते, तो उसकी खामियों को छिपाकर उसे और भी सुंदर बना देते थे। एक दिन एक गरीब और साधारण दिखने वाला वृद्ध उनके पास आया और अपना चित्र बनवाने की इच्छा जताई। विक्रम ने उसे देखा और सोचा कि इसका चित्र बनाने से कोई ख्याति नहीं मिलेगी, इसलिए उसने जानबूझकर उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और एक साधारण सी तस्वीर थमा दी। वृद्ध ने तस्वीर ली और मुस्कुराते हुए कहा कि असली चित्रकार वही है जो बाहरी रूप के साथ-साथ भीतर की सच्चाई को भी कैनवास पर उतार सके। उसने विक्रम को एक जादुई दर्पण दिया जिसमें इंसान का असली चरित्र दिखाई देता था। उस दर्पण में देखने पर विक्रम को अपनी कला का अहंकार साफ नजर आया। उसे अपनी गलती का पछतावा हुआ और उसने कसम खाई कि वह कभी भी किसी इंसान को उसकी बाहरी स्थिति से नहीं आंकेगा।