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अंधेरे में जलती उम्मीद की लौ

रोहित की जिंदगी में जब से उसकी आंखों की रोशनी कम हुई थी, तब तक उसके सारे सपने मानो दम तोड़ चुके थे। वह एक प्रतिभाशाली चित्रकार था और अब कैनवास पर रंग बिखेरना उसके लिए असंभव सा हो गया था। निराशा के इस काले साये में उसकी छोटी बहन नीना ने उसका हाथ थामा और उसे टेक्सचर पेंटिंग की नई दुनिया से परिचित कराया। शुरुआत में रोहित का गुस्सा और हताशा फूट पड़ती थी, लेकिन नीना ने हार नहीं मानी। एक दिन अंधेरे कमरे में उसने रंगों को टटोलकर एक ऐसी अनोखी तस्वीर बनाई जिसे देखकर हर कोई दंग रह गया। उस दिन रोहित को अहसास हुआ कि दृष्टि केवल आंखों से नहीं, बल्कि दिल की गहराइयों और मजबूत इच्छाशक्ति से होती है।

घर वापसी का अनचाहा सफर

सालों बाद जब सोहन अपने पैतृक गांव की धूल भरी पगडंडी पर उतरा, तो उसके कदम खुद-ब-खुद उस टूटे हुए घर की तरफ बढ़ गए जिसे वह कभी छोड़कर भागा था। शहर की चमक-धमक में उसने सब कुछ पा लिया था, सिवाय उस सुकून के जो उसे अपनी माँ के आंचल में मिलता था। जब उसने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, तो दिल जोर से धड़क रहा था। अंदर से बूढ़े हाथों ने दरवाजा खोला और सामने उसकी माँ खड़ी थी। बिना किसी उलाहना या शिकायत के, माँ ने उसे अपनी बाहों में भींच लिया। उस एक आलिगन में शहर की सारी थकान और वर्षों का अकेलापन पल भर में काफूर हो गया। सोहन को समझ आ गया कि सफलता की ऊंची इमारतें उस मिट्टी के घर के आगे बिल्कुल फीकी हैं जहाँ माँ का प्यार बसता है।

अंतिम पन्नों की दास्तान

अमित को अपने दादा जी की अलमारी से एक डायरी मिली जिसके आखिरी पन्ने पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं। दादा जी हमेशा कम बोलते थे और अपने कमरे में अकेले रहना पसंद करते थे, इसलिए अमित उन्हें कभी समझ नहीं पाया था। जब उसने डायरी के वो पन्ने पढ़े, तो उसे पता चला कि दादा जी ने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ परिवार को संवारने के लिए अपनी हर खुशी कुर्बान कर दी थी। यहाँ तक कि उन्होंने अपना पुश्तैनी मकान भी बच्चों की पढ़ाई के लिए बेच दिया था, पर कभी किसी को जुबान से शिकवा नहीं किया। अमित की आँखों से पछतावे के आंसू बहने लगे क्योंकि उसने कई बार अपने दादा जी से ऊंची आवाज में बात की थी। वह दौड़कर दादा जी के कमरे में गया, उन्हें कसकर गले लगा लिया और पहली बार उन्हें एहसास कराया कि वह उनसे कितना प्यार करता है।

बरगद की छांव और पुराना दोस्त

गांव के चौराहे पर खड़े पुराने बरगद के पेड़ के नीचे मोहन और सोहन हर शाम अपनी जवानी के दिनों की बातें किया करते थे। दोनों ने साथ में स्कूल की पढ़ाई की और एक ही सपने के साथ बड़े हुए थे। समय के पहिए ने ऐसी करवट ली कि सोहन शहर का बड़ा व्यापारी बन गया और मोहन गांव में ही खेती-किसानी से जुड़ा रहा। मतभेदों के कारण दोनों के बीच बीस साल तक बातचीत बंद रही। एक दिन सोहन का बेटा उसी गांव में एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आया और उसे अपने पिता के पुराने दोस्त के बारे में पता चला। सोहन बिना देर किए गांव भागा और बरगद के नीचे बैठे मोहन को देखते ही दौड़कर गले मिल गया। सारे गिले-शिकवे पलभर में हवा हो गए और पुरानी दोस्ती फिर से जीवंत हो उठी।

रेगिस्तान में खिलता हुआ गुलाब

रमेश बाबू ने अपनी जिंदगी के पचास साल एक वीरान रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते हुए बिता दिए थे। उनके दोनों पैर जवाब दे चुके थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान हमेशा बनी रहती थी। वह हर महीने अपनी कमाई का आधा हिस्सा पास के अनाथालय में दान कर देते थे। जब लोगों ने उनसे पूछा कि वे अपने बुढ़ापे के लिए क्यों नहीं बचाते, तो रमेश ने कहा कि दूसरों के चेहरों पर खुशी देखना ही उनका असली बैंक बैलेंस है। एक दिन उसी स्टेशन पर एक बड़ा अधिकारी उतरा, जिसने बचपन में रमेश के दिए पैसों से ही अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उस अधिकारी ने रमेश को गले लगाया और उनकी सालों की मेहनत रंग लाई। रमेश की आंखें भर आईं और उन्हें महसूस हुआ कि उनका जीवन वास्तव में सार्थक हो गया था।

बचपन की वह नीली साइकिल

गरीबी के दिनों में सोहन का एकमात्र सपना एक नीली साइकिल खरीदने का था। उसके पिता ने दिन-रात मेहनत करके जैसे-तैसे पैसे जोड़े और उसके जन्मदिन पर उसे वही साइकिल तोहफे में दी। सोहन की खुशी का ठिकाना नहीं था, उसने उस साइकिल को हमेशा अपनी जान से ज्यादा संभाला। वक्त बदला, सोहन बड़ा हुआ और शहर की एक नामी कंपनी में अफसर बन गया। आज उसके पास बड़ी गाड़ियां हैं, लेकिन जब भी वह पुरानी साइकिल को गैराज में देखता है, उसे अपने पिता के माथे का वह पसीना याद आ जाता है जो उन्होंने उसकी खुशी के लिए बहाया था। भौतिक सुखों से परे उस साइकिल में उसके पिता का आशीर्वाद और त्याग बसता था।

रेलवे स्टेशन का आखिरी मुसाफिर

रात के दो बज चुके थे और मानसिंह अपनी आखिरी ट्रेन का इंतजार वीरान प्लेटफॉर्म पर कर रहा था। स्टेशन पर उसके अलावा कोई टिकट कलेक्टर भी नजर नहीं आ रहा था। तभी पटरियों पर लोहे की रगड़ खाने की भयानक आवाज गूंजी और एक पुरानी भाप इंजन वाली ट्रेन आकर रुक गई। डिब्बों की खिड़कियों से कोई रोशनी नहीं आ रही थी। जिज्ञासावश मानसिंह ने एक डिब्बे का दरवाजा खोला और अंदर कदम रखा। अचानक ट्रेन तेजी से चल पड़ी और अंदर बैठे सभी यात्री बिना चेहरे के काले साये निकले। उन्होंने मानसिंह को घेर लिया। सुबह जब पैसेंजर ट्रेन आई, तो मानसिंह उस पटरी से कई मील दूर बेहोश मिला, और उसके हाथ में उसी पुरानी ट्रेन का एक जंग लगा टिकट था।

सुदूर पहाड़ियों का अकेला केबिन

पहाड़ियों के उस ठंडे और कोहरे से ढके इलाके में रोहन ने एक अकेला लकड़ी का केबिन किराए पर लिया था। वह अपनी किताब पूरी करने की शांति चाहता था। पहले दो दिन सब ठीक रहा, लेकिन तीसरे दिन से अजीब घटनाएं होने लगीं। रात को रसोईघर से बर्तन गिरने की आवाजें आतीं, और जब वह देखने जाता, तो वहां कोई नहीं होता। मोड़ तब आया जब उसने अपने कमरे के बंद शीशे पर खुद को नहीं, बल्कि एक धुंधले चेहरे को अपने पीछे खड़े देखा। उसने तुरंत भागने की कोशिश की, लेकिन दरवाजे बाहर से बंद थे। सुबह जब सूरज निकला, तो केबिन बिल्कुल शांत था, और उसके लैपटॉप पर केवल एक वाक्य लिखा था - तुम कभी अकेले नहीं थे।

पुरानी हवेली की परछाइयां

गांव के छोर पर बनी खंडहर नुमा हवेली में जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था, लेकिन कबीर ने एक शर्त के तहत वहां जाने का फैसला किया। उसने हाथ में टॉर्च ली और लकड़ी के चरमराते दरवाजे को धक्का देकर अंदर कदम रखा। अंदर कदम रखते ही उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे सैकड़ों आंखें एक साथ उसी को घूर रही हों। उसने टॉर्च की रोशनी दीवारों पर डाली, जहाँ पुरानी तस्वीरें टंगी थीं और हर तस्वीर की आंखें उसकी तरफ घूम रही थीं। अचानक एक भारी आवाज गूंजी कि यहाँ से कभी कोई वापस नहीं गया, और दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

सपनों का खौफनाक सफर

अमित को पिछले कुछ दिनों से एक ही सपना बार-बार आ रहा था, जिसमें एक सुनसान सड़क पर कोई उसका पीछा कर रहा था। शुरुआत में उसने इसे महज एक आम सपना समझकर नजरअंदाज कर दिया, लेकिन एक रात उसने सपने में खुद को उस सड़क पर सचमुच दौड़ते हुए पाया। जब उसकी नींद खुली, तो उसके पैरों में असली धूल और मिट्टी जमी हुई थी। अगली रात, उसने तय किया कि वह सपने के अंत तक जाएगा और उस पीछा करने वाले का चेहरा देखेगा। जैसे ही वह मुड़ा, उसने पाया कि वह भयानक साया कोई और नहीं बल्कि उसका अपना ही अतीत था।

नीली रोशनी का साया

रोहन ने जब अपने नए कमरे में प्रवेश किया, तो उसे दीवारों पर अजीब से नीले धब्बे दिखाई दिए। उसे लगा कि शायद यह सीलन का असर होगा, इसलिए उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। रात के ठीक बारह बजे, कमरे का तापमान अचानक बहुत कम हो गया और एक अजीब सी फुसफुसाहट सुनाई देने लगी। रोहन ने उठकर देखा तो कोने में रखी पुरानी अलमारी अपने आप खुल रही थी। अलमारी के भीतर से कोई अदृश्य ताकत बाहर आई और उसके ठीक सामने आकर खड़ी हो गई। उसने डरकर आंखें बंद कर लीं और जब सुबह हुई, तो वह कमरा पूरी तरह बदल चुका था।

काले पानी का रहस्य

शहर के एक पुराने और गहरे कुएं के पास जाने से हर कोई डरता था। लोक कथाओं के अनुसार, उस कुएं का पानी किसी की प्यास नहीं बुझाता बल्कि उसकी आत्मा खींच लेता है। तरुण एक विज्ञान का छात्र था और इन अंधविश्वासों को नहीं मानता था। एक पूर्णिमा की रात, वह उस कुएं के पास गया और उसका पानी झांककर देखने लगा। पानी बिल्कुल शांत था, लेकिन अचानक उसमें से एक काले धुएं का हाथ निकला और तरुण की कलाई को पकड़ लिया। तरुण ने जब खुद को छुड़ाने की कोशिश की, तो कुएं के भीतर से सैकड़ों डरावनी आवाजें आने लगीं जो उसका नाम पुकार रही थीं।