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हाल की खोजें: बचपन
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अल्मारी में रखी पुरानी डायरी

सफाई करते वक्त आलोक के हाथ उसकी मां की बरसों पुरानी डायरी लग गई। धूल झाड़कर उसने जब पन्ने पलटे, तो मां के हाथों की सुंदर लिखावट ने उसे अतीत में धकेल दिया। हर पन्ने पर उसके बचपन की कोई न कोई खट्टी-मीठी याद दर्ज थी। एक पन्ने पर लिखा था कि कैसे उसने तेज बुखार में पूरी रात जागकर आलोक की सेवा की थी। यह सब पढ़ते हुए आलोक की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि कैसे व्यस्तता के चलते उसने अपनी मां को पिछले कुछ महीनों से फोन तक नहीं किया था। मां तो अब इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन डायरी के उन शब्दों ने उसे झकझोर कर रख दिया। उसने डायरी को अपने सीने से लगाया और खुद से वादा किया कि वह रिश्तों को कभी पीछे नहीं छोड़ेगा।

अटेरे में रखी धूल भरी ट्रंक

जब रोहन ने अपने पुरखों के घर की सफाई शुरू की, तो अटारी के एक कोने में उसे लोहे की भारी ट्रंक मिली। उस पर समय की धूल और जंग की परतें जमी हुई थीं। बड़ी मुश्किल से जब उसने उसका ताला खोला, तो अंदर बचपन की कई अनमोल चीजें और उसकी माँ की साड़ियां रखी मिलीं। साड़ियों की तहों के बीच से एक लिफाफा गिरा जिस पर रोहन का नाम लिखा था। वह खत उसकी माँ ने उसके बोर्ड परीक्षा के दिनों में लिखा था, जिसमें उसकी सफलता के लिए दुआएं और अगाध प्रेम था। उस खत को पढ़ते ही रोहन की आँखों से आंसू बह निकले। वह समझ गया कि माँ भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका आशीर्वाद आज भी उसके साथ है। इस अनपेक्षित उपहार ने उसके भीतर एक अजीब सी शांति भर दी और उसने ट्रंक की हर चीज़ को सीने से लगा लिया।

पिता की पुरानी साइकिल की घंटी

सुबह के ठीक छह बजे जब भी गली में साइकिल की घंटी बजती थी, सोहन समझ जाता था कि उसके पिता काम से लौट आए हैं। वह घंटी सिर्फ एक साइकिल का हिस्सा नहीं थी, बल्कि उसके सुरक्षित बचपन का एक प्रतीक थी। समय बीता, पिता का साया उठ गया और वह पुरानी साइकिल जंग खाकर कबाड़ बन गई। सोहन ने उस साइकिल को कबाड़ में बेचने का फैसला किया और मैकेनिक को बुला लिया। जैसे ही मैकेनिक उसे ले जाने लगा, सोहन का बेटा दौड़कर आया और उसने उस टूटी हुई घंटी को निकाल कर अपने हाथ में रख लिया। उसने जैसे ही घंटी बजाई, उसकी आवाज़ ने सोहन के भीतर दबे बचपन के सारे अहसासों को फिर से जीवंत कर दिया। सोहन की आंखें भर आईं और उसने मैकेनिक को पैसे देकर साइकिल वापस रखवा ली। उस घंटी की खनक ने उसे याद दिलाया कि पिता कहीं नहीं गए, वे आज भी उसकी हर सुबह में मौजूद हैं।

माँ के हाथों की बनी आखिरी चाय

किचन से आती अदरक और इलायची की खुशबू ने अचानक सुमित को उसके बचपन के दिनों में वापस खींच लिया। वह लैपटॉप पर काम कर रहा था, लेकिन ध्यान उस गर्म प्याले पर था जो हमेशा उसकी माँ उसके पास रख जाया करती थी। आज माँ इस दुनिया में नहीं हैं, और यह खुशबू सिर्फ उनकी यादों का एक धुंधला सा हिस्सा बनकर रह गई है। सुमित ने जब उस खाली मेज़ को देखा, तो आँखों से आँसू छलक आए। तभी हवा का एक तेज झोंका आया और खिड़की पर रखा माँ का पसंदीदा पौधा हल्का सा हिल गया, मानो वह कह रहा हो कि वह अभी भी यहीं आस-पास हैं। उस पल सुमित को अहसास हुआ कि अपनों का साथ भले ही छूट जाए, लेकिन उनका प्यार और उनकी दी हुई सीख हमेशा हमारे साथ रहती है। उसने गहरी साँस ली, प्याले को छुआ और अपने काम में फिर से जुट गया, इस बार दिल में एक अजीब सा सुकून लेकर।

समुद्र किनारे रेत पर लिखा हुआ नाम

अनंत ने अपनी जिंदगी के कई साल सिर्फ पैसे कमाने की अंधी दौड़ में बिता दिए थे। इस दौड़ में वह अपने पुराने दोस्तों और परिवार से दूर हो गया था। जब वह तनाव से घिर गया, तो वह शहर छोड़कर समुद्र के शांत किनारे पर चला गया। वहाँ उसने गीली रेत पर अपने बचपन के सबसे अच्छे दोस्त का नाम लिखा, जिससे उसकी अनबन हो गई थी। लहरें आईं और उस नाम को अपने साथ बहा ले गईं। उस पल उसे समझ आया कि जिद और अहंकार से कुछ नहीं मिलता, रिश्ते रेत की तरह होते हैं जिन्हें बहुत संभाल कर रखना पड़ता है। उसने तुरंत अपने फोन से अपने दोस्त को फोन मिलाया।

पुरानी लकड़ी की बेंच और खामोश निगाहें

शहर के बीचों-बीच बने इस पार्क की पुरानी लकड़ी की बेंच पर रोज एक बूढ़ा आदमी आकर बैठता था। वह घंटों खाली आसमान को देखता रहता, मानो किसी का इंतजार कर रहा हो। एक दिन एक छोटे बच्चे ने उसके पास आकर पूछा कि वह रोज यहाँ अकेले क्यों बैठते हैं। बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह बेंच वही जगह है जहाँ उन्होंने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल बिताए थे। समय बीत गया, लोग बदल गए, लेकिन यादें आज भी यहीं टंगी हैं। उस बच्चे ने अपनी टॉफी उस बुजुर्ग के साथ बांटी, और अचानक उस बूढ़े चेहरे पर एक ऐसी राहत भरी मुस्कान आई जो महीनों से गायब थी।

खोया हुआ विश्वास

अमित और सोहन बचपन के पक्के यार थे। दोनों हर सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। कॉलेज के दिनों में एक गलतफहमी ने उनके बीच ऐसी दीवार खड़ी की कि दोनों ने दस साल तक एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखा। समय बीतता गया और दोनों अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए। एक दिन शहर के एक पुराने बाजार में अचानक दोनों आमने-सामने आ गए। कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया, फिर सोहन ने आगे बढ़कर अमित को गले से लगा लिया। उस एक आलिंगन ने बरसों की कड़वाहट को एक पल में धो दिया और दोस्ती का रिश्ता फिर से जीवंत हो उठा।

बचपन की गुल्लक और पुराना कर्ज

दुकान के कोने में धूल फांक रही पुरानी लकड़ी की गुल्लक देखकर मदन को अपने बचपन के वे दिन याद आ गए जब उसने एक-एक सिक्का जोड़कर अपनी बहन की शादी के लिए पैसे बचाए थे। आज मदन खुद एक बड़े बैंक का मैनेजर था, जिसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह अंदर से बहुत अकेला हो चुका था। उसने जब उस गुल्लक को खोला, तो उसके अंदर से बचपन की एक पर्ची निकली जिस पर लिखा था- मेरा सबसे बड़ा धन मेरा परिवार है। इस एक वाक्य ने उसकी आंखों से अहंकार का पर्दा हटा दिया। उसी रात उसने अपने व्यस्त शेड्यूल से समय निकाला और फोन उठाकर अपने बिछड़े हुए भाई को गले मिलने के लिए आमंत्रित किया।

कागज की नाव और उम्मीद का समंदर

बरसात की पहली फुहार के साथ ही मोहल्ले के बच्चे गलियों में कागज की नावें तैराने लगे थे। नन्हें हाथों द्वारा बनाई गई वे रंगबिरंगी नावें पानी के तेज बहाव के साथ आगे बढ़ रही थीं। एक कोने में खड़े होकर मैं अपने बचपन के उन दिनों को याद करने लगा जब हर छोटी सी जीत पर दिल खुशी से झूम उठता था। तभी एक छोटी सी नाव भंवर में फंसकर डूबने लगी, जिसे देखकर मेरा दिल बैठ गया। लेकिन अगले ही पल पानी के एक शांत बहाव ने उसे फिर से उबार लिया। जीवन की कसौटी भी कुछ ऐसी ही है, जहां हार के डर के बाद ही असली जीत का रास्ता दिखाई देता है।

पुरानी छत और नए सपने

शहर की चकाचौंध से दूर जब मैं अपने पुस्तैनी घर लौटा, तो छत की ईंटें मुझे अपनी दास्तान सुनाने लगीं। यहीं बैठकर कभी मैंने खुले आसमान में ऊंचे उड़ने के सपने देखे थे। वक्त के साथ जिम्मेदारियों के बोझ ने उन सपनों को कहीं पीछे छोड़ दिया था। आज जब मैंने धूल जमी छत पर कदम रखा, तो बचपन की पतंगबाजी की यादें ताजा हो गईं। मेरे बेटे ने मेरे हाथ में एक कच्ची डोर थमाई और खुद पतंग आसमान में लहराने लगा। उस उड़ती हुई पतंग को देखकर मुझे एहसास हुआ कि सपने कभी मरते नहीं, बस उनका रंग बदल जाता है। पुरानी छत ने मुझे मेरे बचपन से दोबारा मिला दिया और चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई।

अल्मारी के कोने में रखी पुरानी घड़ी

दीपावली की सफाई के दौरान जब अनाहिता ने घर के पुराने स्टोर रूम की सफाई शुरू की, तो उसकी नजर लकड़ी की एक पुरानी संदूकची पर पड़ी। उसने धूल झाड़कर उसे खोला तो अंदर उसके दादाजी की कलाई पर बंधने वाली वह पुरानी टिक-टिक करती घड़ी मिली, जो सालों पहले बंद हो गई थी। अनाहिता ने उसे उठाया और जैसे ही उसने उसकी चाबी घुमाने की कोशिश की, अचानक से घड़ी की सुइयां हिलने लगीं और उसकी पुरानी टिक-टिक की आवाज गूंज उठी। उस आवाज के साथ ही बचपन की वे तमाम यादें ताजा हो गईं जब दादाजी उसे पार्क ले जाया करते थे और अपनी कलाई की घड़ी दिखाकर उससे समय पूछा करते थे। अनाहिता की पलकें नम हो गईं और उसने घड़ी को अपने सीने से लगा लिया। उस एक पल में बीता हुआ पूरा बचपन जैसे फिर से लौट आया हो।

बरगद की छांव और पुराना दोस्त

गांव के चौराहे पर खड़े पुराने बरगद के पेड़ के नीचे मोहन और सोहन हर शाम अपनी जवानी के दिनों की बातें किया करते थे। दोनों ने साथ में स्कूल की पढ़ाई की और एक ही सपने के साथ बड़े हुए थे। समय के पहिए ने ऐसी करवट ली कि सोहन शहर का बड़ा व्यापारी बन गया और मोहन गांव में ही खेती-किसानी से जुड़ा रहा। मतभेदों के कारण दोनों के बीच बीस साल तक बातचीत बंद रही। एक दिन सोहन का बेटा उसी गांव में एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आया और उसे अपने पिता के पुराने दोस्त के बारे में पता चला। सोहन बिना देर किए गांव भागा और बरगद के नीचे बैठे मोहन को देखते ही दौड़कर गले मिल गया। सारे गिले-शिकवे पलभर में हवा हो गए और पुरानी दोस्ती फिर से जीवंत हो उठी।