टूटते तारे

टूटते तारे

“
रात के अंधेरे में टूटते तारे को देख कर, हमने भी अपनी किसी हसरत को रुखसत कर दिया। जो अपना कभी हो ही नहीं सका, उसे दिल से बेदखल कर दिया।
👁️ 1 बार पढ़ा गया ❤️ लोगों ने पसंद किया

टिप्पणियाँ

अभी कोई स्वीकृत टिप्पणी नहीं है।

लॉगिन करके टिप्पणी करें। प्रकाशित होने से पहले हर टिप्पणी की समीक्षा होती है।

संबंधित शायरी (Related Shayari)

टूटा हुआ विश्वास

कुछ रिश्ते वक्त के साथ ऐसे छूटे, जैसे पतझड़ में पेड़ से सूखे पत्ते टूटते हैं। अब तो खुद की आवाज से भी डर लगने लगा है, क्योंकि हर खुशी के पीछे एक छिपा हुआ धोखा नजर आता है।

सन्नाटे की गूंज

इन दीवारों से अब क्या शिकवा करें, जब अपने ही साये ने साथ छोड़ दिया। अंधेरे कमरे में बैठी यह तन्हाई, हर पुराने जख्म को फिर से कुरेद जाती है।

रेत के महल

हमने समंदर किनारे जो उम्मीद के महल बनाए थे, लहरों ने एक ही झटके में सब कुछ बहा दिया और हम देखते रह गए।