गुमशुदा यादों का शहर
रमेश बाबू कई वर्षों बाद उस शहर लौटे थे जहाँ उन्होंने अपनी जवानी के सुनहरे दिन बिताए थे। शहर की हर गली बदल चुकी थी, ऊँची इमारतें और चौड़ी सड़कें बन चुकी थीं। उनके कदम खुद-ब-खुद उस पुराने बाजार की तरफ बढ़े जहाँ कभी उनकी चाय की दुकान हुआ करती थी। दुकान की जगह अब एक बड़ा शॉपिंग मॉल खड़ा था, जिसे देखकर उनका दिल भर आया। अचानक उनकी नजर एक बुजुर्ग पर पड़ी जो कोने में बैठकर पेंटिंग बेच रहे थे। वह और कोई नहीं, उनका कॉलेज के दिनों का जिगरी यार सोहन था, जिससे किसी गलतफहमी के कारण पचास साल पहले रिश्ता टूट गया था। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे कसकर गले लग गए। समय ने उनके चेहरे पर झुर्रियाँ भले ही डाल दी थीं, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक और अपनेपन का एहसास आज भी जिंदा था।
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