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माटी के दीये और उम्मीद की रात

दीपावली की रौनक हर तरफ थी, लेकिन कुम्हार मंगेश के घर में अंधेरा पसरा था। उसके बनाए हुए एक भी दीये इस बार नहीं बिके थे, क्योंकि लोग अब चाइनीज लड़ाइयों और मोमबत्तियों के दीवाने हो चुके थे। मंगेश मायूस होकर अपने चाक के पास बैठा सोच रहा था कि इस बार बच्चों को क्या जवाब देगा। तभी पड़ोस के छोटे से बच्चे ने आकर उसकी सारी उम्मीद जगा दी। उस बच्चे ने कहा कि असली रोशनी तो माटी के दीयों में ही होती है, मशीन के बने सामान में कहां जान होती है। बच्चे के उन मासूम शब्दों ने मंगेश के भीतर एक नई ऊर्जा भर दी। उसने अपनी थकान भूला दी और फिर से दीयों को सजाने लगा। उस रात मंगेश के घर के दीये भले ही कम जले, लेकिन उसके दिल में जलती उम्मीद की लौ ने पूरे मोहल्ले को रोशन कर दिया था।

गुलाब के पौधे की देखभाल करती वृद्धा

वृद्धा आश्रम के कोने में बनी छोटी सी क्यारी में कमला जी रोज सुबह पानी डाला करती थीं। उनके पास इस दुनिया में अपना कहने के लिए कोई नहीं था, सिवाय इन गुलाब के पौधों के जिन्हें उन्होंने अपने हाथों से सींचा था। लोग कहते थे कि वे किस बात का इंतजार कर रही हैं, जब उनके अपने ही उन्हें यहाँ छोड़ गए हैं। लेकिन कमला जी की आँखों में शिकायत नहीं, बल्कि एक अजीब सी उम्मीद थी कि शायद कभी कोई अपना उनसे मिलने आएगा। एक दिन जब एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर उस क्यारी के पास आया और उसने एक फूल को छुआ, तो कमला जी के चेहरे पर बरसों बाद वैसी ही मुस्कान लौटी जैसी कभी उनके अपने बच्चों के होने पर हुआ करती थी। उस एक पल ने उनके सूनेपन को इस तरह भर दिया कि उन्हें लगा जैसे पूरी दुनिया की खुशियाँ उन्हें मिल गई हों।

पिता का पुराना चमड़े का ब्रीफकेस

अलमारी के सबसे निचले हिस्से में धूल फांक रहा वह पुराना चमड़े का ब्रीफकेस आज बाहर निकला था। रोहन ने जब उसकी चेन खोली, तो अंदर से कुछ पुराने कागजात और एक टूटी हुई कलम निकली। यह वही ब्रीफकेस था जिसे उसके पिता रोज सुबह दफ्तर लेकर जाते थे और जिसके लौटने की आवाज सुनकर रोहन दौड़कर गेट पर पहुँच जाता था। उन दिनों रोहन को लगता था कि इस ब्रीफकेस में दुनिया भर की खुशियाँ और जरूरत का सामान बंद है। लेकिन वक्त बीतने के साथ रोहन खुद उसी दौड़ का हिस्सा बन गया, और पिता की मेहनत की कीमत उसे अब समझ आई जब वह खुद अपने बच्चों की जिम्मेदारियों में उलझ चुका था। उसने उस ब्रीफकेस को अपने सीने से लगा लिया और उसकी आँखों के सामने पिता का थका हुआ लेकिन मुस्कुराता चेहरा तैर गया। यह ब्रीफकेस सिर्फ चमड़े का थैला नहीं, बल्कि एक पिता के अंतहीन संघर्ष और त्याग की मूक दास्तान था।

समुद्र किनारे रेत पर लिखा हुआ नाम

अनंत ने अपनी जिंदगी के कई साल सिर्फ पैसे कमाने की अंधी दौड़ में बिता दिए थे। इस दौड़ में वह अपने पुराने दोस्तों और परिवार से दूर हो गया था। जब वह तनाव से घिर गया, तो वह शहर छोड़कर समुद्र के शांत किनारे पर चला गया। वहाँ उसने गीली रेत पर अपने बचपन के सबसे अच्छे दोस्त का नाम लिखा, जिससे उसकी अनबन हो गई थी। लहरें आईं और उस नाम को अपने साथ बहा ले गईं। उस पल उसे समझ आया कि जिद और अहंकार से कुछ नहीं मिलता, रिश्ते रेत की तरह होते हैं जिन्हें बहुत संभाल कर रखना पड़ता है। उसने तुरंत अपने फोन से अपने दोस्त को फोन मिलाया।

अंधेरे कमरे में गूंजती संगीत की धुन

रोहन की आँखों की रोशनी एक हादसे में चली गई थी, जिसके बाद उसकी दुनिया पूरी तरह से थम सी गई थी। उसे संगीत से बहुत प्यार था, लेकिन नजर जाने के बाद उसने अपना रियाज भी छोड़ दिया था। उसके कमरे की खिड़की पर हमेशा धूल जमी रहती थी। एक दिन उसकी छोटी बहन ने उसके हाथ में पुराना गिटार लाकर रख दिया और जिद करने लगी कि वह उसके लिए गाए। रोहन ने कांपते हाथों से तारों को छुआ और पहली धुन छेड़ी। उस अंधेरे कमरे में जैसे उम्मीद की नई किरण उतर आई। उसे समझ आ गया कि दृष्टि खोने से सपने नहीं मरते, बस उन्हें देखने का जरिया बदल जाता है।

पुरानी लकड़ी की बेंच और खामोश निगाहें

शहर के बीचों-बीच बने इस पार्क की पुरानी लकड़ी की बेंच पर रोज एक बूढ़ा आदमी आकर बैठता था। वह घंटों खाली आसमान को देखता रहता, मानो किसी का इंतजार कर रहा हो। एक दिन एक छोटे बच्चे ने उसके पास आकर पूछा कि वह रोज यहाँ अकेले क्यों बैठते हैं। बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह बेंच वही जगह है जहाँ उन्होंने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल बिताए थे। समय बीत गया, लोग बदल गए, लेकिन यादें आज भी यहीं टंगी हैं। उस बच्चे ने अपनी टॉफी उस बुजुर्ग के साथ बांटी, और अचानक उस बूढ़े चेहरे पर एक ऐसी राहत भरी मुस्कान आई जो महीनों से गायब थी।

रेलवे ट्रैक के किनारे बसा आशियाना

हर गुजरती ट्रेन के साथ सोहन के घर की दीवारें कांप उठती थीं। वह सालों से रेलवे लाइन के ठीक पास बनी झुग्गी में रहता था। उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर एक बेहतर इंसान बनाना था। दिनभर धूप में मजदूरी करने के बाद भी उसकी आँखों में एक चमक होती थी। एक दिन, जब उसकी बेटी ने राज्य स्तर की परीक्षा में टॉप किया, तो सोहन की आँखें खुशी के आंसुओं से भर गईं। उसे अहसास हुआ कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा हो, अगर नीयत साफ हो और सपने सच्चे हों, तो गरीबी की दीवारें भी एक दिन ढह जाती हैं। उस शाम उसने अपनी बेटी के साथ बैठकर सूखी रोटियां खाईं, लेकिन वो खाना किसी दावत से कम नहीं था।

बंजर ज़मीन और उम्मीद का बीज

गांव के पास फैली वह बंजर जमीन किसी के काम नहीं आती थी। सब लोग कहते थे कि यहाँ कभी कुछ नहीं उग सकता। पर मोहन ने ठान लिया था कि वह इस जमीन को हरा-भरा करके दिखाएगा। उसने दिन-रात एक करके कुआं खोदा और पौधे लगाए। महीनों तक पानी सींचने के बाद भी जब कोई बदलाव नहीं दिखा, तो गाँव वाले उसका मजाक उड़ाने लगे। लेकिन एक दिन अचानक नन्हे पत्तों ने जमीन को चीरकर बाहर झांका। मोहन की मेहनत रंग लाई थी और वह बंजर ज़मीन अब लहलहाते खेतों में बदल चुकी थी, जो सबको विश्वास का पाठ पढ़ा रही थी।

सांझ का सुकून

गांव के छोर पर बने उस पुराने घर में दादी अकेली रहती थीं। उनके बच्चे शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में इतने उलझ गए थे कि महीनों फोन तक करना भूल जाते थे। दादी हर शाम दरवाजे पर बैठकर किसी के आने का इंतजार करती थीं। गाँव के बच्चे उनके पास आकर कहानियाँ सुनते और उनका अकेलापन बांटते थे। एक दिन अचानक उनके बेटे और पोते बिना बताए घर पहुँच गए। दादी ने जब उन्हें सामने देखा, तो उनकी झुर्रियों वाले चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई। उस शाम उस सूने घर में हंसी-खुशी की ऐसी गूंज उठी कि सारे गम दूर हो गए।

खोया हुआ विश्वास

अमित और सोहन बचपन के पक्के यार थे। दोनों हर सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे। कॉलेज के दिनों में एक गलतफहमी ने उनके बीच ऐसी दीवार खड़ी की कि दोनों ने दस साल तक एक-दूसरे का चेहरा तक नहीं देखा। समय बीतता गया और दोनों अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए। एक दिन शहर के एक पुराने बाजार में अचानक दोनों आमने-सामने आ गए। कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया, फिर सोहन ने आगे बढ़कर अमित को गले से लगा लिया। उस एक आलिंगन ने बरसों की कड़वाहट को एक पल में धो दिया और दोस्ती का रिश्ता फिर से जीवंत हो उठा।

सपनों का नया सवेरा

सुबह की पहली किरण जब कमरे की खिड़की से अंदर आई, तो राहुल की आँखें खुल गईं। आज उसका इंटरव्यू था, जिसके लिए उसने महीनों से रात-दिन एक कर दिए थे। उसके पिता की साइकिल की दुकान से लेकर इस शहर के बड़े दफ्तर तक का सफर आसान नहीं था। अचानक रास्ते में उसकी स्कूटी खराब हो गई और उसे लगा कि आज सब खत्म हो गया है। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और दौड़कर समय पर दफ्तर पहुँच गया। जब इंटरव्यू के बाद उसे चयन का पत्र मिला, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती और हर नई सुबह एक नई उम्मीद लेकर आती है।

बचपन की गुल्लक और पुराना कर्ज

दुकान के कोने में धूल फांक रही पुरानी लकड़ी की गुल्लक देखकर मदन को अपने बचपन के वे दिन याद आ गए जब उसने एक-एक सिक्का जोड़कर अपनी बहन की शादी के लिए पैसे बचाए थे। आज मदन खुद एक बड़े बैंक का मैनेजर था, जिसके पास धन की कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह अंदर से बहुत अकेला हो चुका था। उसने जब उस गुल्लक को खोला, तो उसके अंदर से बचपन की एक पर्ची निकली जिस पर लिखा था- मेरा सबसे बड़ा धन मेरा परिवार है। इस एक वाक्य ने उसकी आंखों से अहंकार का पर्दा हटा दिया। उसी रात उसने अपने व्यस्त शेड्यूल से समय निकाला और फोन उठाकर अपने बिछड़े हुए भाई को गले मिलने के लिए आमंत्रित किया।